दीवाना कहते हैं मुझको
By Siddharth Janartha
कभी जो मन में आए मेरे
रोक उसे मैं बोलूं ना
दुनिया की बातों में सार नहीं है
लेकिन मैं मुंह ही खोलूं ना
मैं तो अलग हूं, याद ये रख लूं
खुद को सबके बाद में रख लूं
जिम्मेदारी कंधों पर चक लूं
और राह पे डोलूं ना
पर आग पराई का बेमतलब
परवाना कहते हैं मुझको
दीवाना कहते हैं मुझको
शायर को कुछ काम नहीं है
बैठ छंद जोड़े रहता है
दुनिया की ये सर्द हवाएं
कविताएं ओढ़े रहता है
घूमा करता है ये शहर
आधी रात या दोपहर
शाम तलक या फिर हो सहर
विष प्याला पीते रहता है
दुनिया के सुख-दुख से दूर
बेगाना कहते हैं मुझको
दीवाना कहते हैं मुझको
By Siddharth Janartha

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