दिल से दिल की बात
By Amarjit Kaur
ये है दिल से दिल की बात,
कैसे भूल सकती हूँ तुमसे वो पहली मुलाक़ात,
उस मुलाक़ात से इक नए सुहाने सफ़र का था आगाज़ हुआ,
तुम्हारे साथ ने जीवन के हर पहलू को गहराई से छुआ।
क्या कशिश थी तुम्हारी आँखों में,
आँखें बिछी रहती थी तुम्हारी राहों में।
तुम्हें देखकर अब जब भी मन भरता है,
तो दिल से इक आवाज़ आती है,
इन आँखों को यूँ नम ना करो,
तुम्हारी मुस्कुराहट में ही तो मेरी मुस्कान बाकी है।
अब बढ़ गई है चाहत कुछ ऐसी,
कि मेरा नाम भी तुम्हारे नाम में समा गया है,
रहनुमा बन गए हो तुम हमसफ़र से,
तुम्हारा प्यार जीने का हुनर सिखा रहा है।
ये है दिल से दिल की बात।
By Amarjit Kaur

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