दिल-ए-दास्ताँ
By Arvind Chhipa
बारिश हूँ, रिमझिम सा बरसता हूँ मैं।
तन्हा जब होता हूँ, तो गुमसुम सा रहता हूँ मैं।
दिल को चुभ जाए कोई बात तो भी ना कहता हूँ मैं।
कैसे करूँ मैं लफ़्ज़ों में बयां, बस सहता हूँ मैं।
हो गया हूँ बेजार जिंदगी से फ़िर भी चलते चलता हूँ मैं।
मुक़म्मल ना हो जो ख़्वाहिश कोई तो हाथ मलता हूँ मैं।
छोटी छोटी सी बातों से पल-पल जलता हूँ मैं।
मगर आखिर में तमाम गम भुलाकर बस हँसता हूँ मैं।
दिल का हूँ साफ़ मगर फ़िर भी क्यों जलता हूँ मैं।
रोशनीसेकुछगिलेहैंमेरे, सूरजकीतरहढलताहूँमैं।
By Arvind Chhipa

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