दादी का झोला
By Aayu Sharma
दादी के झोले में दो सादिया, तीन गाउन, एक दवाई का डब्बा और कुछ फटी हुई से किताबे है। झोला काफी पुराना है और गन्दा हो गया ह। कितने भी बार धो लो, उसकी बू पुई तरह जाती ही नहीं और कुछ दाग है जो झोले का ही हिस्सा बन गए ह।
मुझे उस से घिन्न आती ह। घर में सभी को आती है मगर पापा और भाई उसे हाथ नहीं लगात। मुझे और माँ को हाथ लगाना पड़ता है। उसका पट्टा गल गल के फटने लगा है। कुछ मोटे धागे और सिलाई के सहारे अब भी जुड़ा हुआ है। अगर टूट गया तो ना ही किसी को आश्चर्य होगा ना ही दुःख।
दादी जहाँ भी जाती है साथ ले जाती है। कुछ दिन ताऊजी के यहाँ, कुछ दिन हमारे यहाँ, कुछ दिन बुआ के घर। दादी इन जगहों को घर नहीं कहती। कुछ महीनो से ज़्यादा कहीं नहीं रूकती।
बहार जाओ तो दादी का झोला भाई को नहीं मुझे उठाना पड़ता है। घर में दादी का झोला माँ को धोना पड़ता है। माँ नहीं धोना चाहती मगर दादी से नहीं कहती। मैं भी उस झोले को नहीं उठाना चाहती मगर में कह देती हु। दादी कहती है "उठाना पड़ता है। उन्होंने भी अपनी दादी का झोला उठाया था।
दिल करता है उस झोले को पहाड़ के फेक दू या फिर जला दू।
मगर ऐसा किआ तो दादी दूसरा झोला निकल लेगी।
कुछ दिनों बाद उसमे से भी बू आएगी।
फिर से उसकी सफाई करेंगे, फिरसे उसे फेकने की आस रखेंगे।
By Aayu Sharma

Comments