दर्पण
By भारती बिंदु
उसने देखा इक छोटा-सा दर्पण
किया स्वयं को संपूर्ण समर्पण !!
दिखा उसे उसमें अपना ही रूप
सुन्दर सुधर सशक्त स्वस्थ स्वरूप !!
दिखाई दे गया अपना अनुभव
जो कमाया व गवाया हर सम्भव !!
चेहरे की रेखाएं उम्र बता रही थी
न चाहते हुए उसको सता रही थी !!
किन्तु यह क्या?दिख रहा ये कौन?
जानता है !!फिर क्योंकर है मौन!!
कदापि नहीं उसका यह वहम है
जो दिख रहा वो तो उसका अहं है !!
रक्त नेत्र मध्य सख्त क्रूर कुरूप
और कोई नहीं वही अहं प्रतिरूप!!
त्वरित ही मुख कुटिल स्मित की रेखा
आई गई और उसने सहज ही देखा!!
सौंदर्य पद प्रतिष्ठा अर्थ गर्व से युक्त
सहज स्नेह संस्कार सभ्यता से मुक्त!!
दिव्य दर्प युक्त विराट भाल प्रत्यर्पण
परिभाषित हुआ आज नाम "दर्पण"!!
By भारती बिंदु

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