दंगों का दर्द
By Narjeev Singh
बेवजह गम क्यों
देता है कोई
आँख हुई नम
तो क्या करेगा कोई
उजाड़ के चला गया
वह बसन्त बस्ती को
बच्चे माँ के बिना
माँ बच्चों के बिना हो गई
देखनी थी जिन नन्ही
आँखों को ये दुनियाँ
वक्त से पहले
क्यों वह सो गई
चलना था जिसको
अभी आगे बहुत
अब अपंग हो गई
भीड़ में रहते भी
क्यों वह तन्हा हो गई
क्या हर तरफ दहशत
का मंजर चाहिए इनको
कैसी ये मानवता हो गई
लड़ने वालों का पता नहीं
ये कैसी शरेआम जंग हो गई
क्यों आदमी को
आदमी खटकता है
क्यों नाराज़ हो गया है कोई
कब तक होते रहेंगे ये दंगें
क्या इंसाफ करेगा कोई
बड़े -बड़े नेताओं की
बड़ी -बड़ी बातें हो गई
कहते हैं कार्यवाही सख्त होगी
पर बरबाद तो
हो गया है कोई
By Narjeev Singh

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