तो क्या बात होगी......
By Sanchita S K Behera
माना की मैं पसंद हूं तुम्हें,
पर तुम अगर मुझे चाहने लगो तो क्या बात होगी?
यूं नज़रे चुराए नज़र से कुछ बातें यूं ही कह देते हो,
पर जो नजरों की ये दहलीज तुम पार करो तो क्या बात होगी?
उलझा कर डोर नजरों की जो यूं गुजर जाते हो,
अगर ठहर के कुछ बातें करने लगो तो क्या बात होगी?
यूं तो दुनियां के हर रंग में पहचान लेते हो तुम मुझे,
अगर तुम ही मेरी दुनियां बन जाओ तो क्या बात होगी?
फिकर तो काफी करते हो तुम मेरी,
अगर कुछ हम बेफिक्र बन जाओ तो क्या बात होगी?
तेरी ये जो बात पर मुस्कुराने की आदत है,
अगर किसी रोज़ इस मुस्कुराहट की वजह जान लू तो क्या बात होगी?
बातें बताकर तो यहां हर कोई जान जाता हैं,
हम खामोशियां जो कभी पढ़ने लगे एक दूसरे की तो क्या बात होगी?
हरकतों ही हरकतों में यूं बातें तो हजार बताते हैं,
अगर खुल कर जो कभी इरादे बताने लगे तो क्या बात होगी?
यूं खामखा खयालों में आना जाना लगा रहता हैं तेरा,
अगर तुम मेरे ही खयालों में बस जाओ तो क्या बात होगी?
अब तुमसे दूर हूं तो ये खयाल हैं,
अगर कहीं फिर जो मिल जाए, सोचती हूं फिर क्या बात होगी?
By Sanchita S K Behera

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