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तैरता मोरपंख और डूबता पाषाण

Apr 20, 2023
3 min read

By Neha Mahendra Jain


कुरुक्षेत्र पर अंतिम साँसे गिन रहे कर्ण ने श्रीकृष्ण को विचारा था।

बताओ मोहन भूल क्या हुई जो अन्याय के विरुद्ध युद्ध पुकारा था॥

जन्म होते ही जन्मदात्री ने त्यागा निष्ठुर हो नदियों में बहाया था।

दुसरे मात-पिता के घर अन्त में शब्दश: मैं गैर ही तो कहलाया था॥

क्या अपराध किया जो मैने धनुर्धारी बनने का संकल्प सुनाया था।

उसमे भी सूतपुत्र कहके जग ने मेरे स्वप्नोंका उपहास बनाया था॥

देखो माधव नियति ने मेरी कैसा अनोखा षडयंत्र पकाया था।

जो मैं था मुझे ज्ञात न था, जो मैं नही था उस कारण ज्ञान रुकाया था॥

क्या सूत होना था बुरा इतना तुमने भी तो अर्जुन का रथ चलाया था।

क्या दोष था मेरा जो मुझे गुरु द्रोण ने विद्यादान से दूर भगाया था॥

विद्यार्जन से वंचित होकर साक्षात श्री परशुराम शरण मैं आया था।

किन्तु इस बार ठानकर गुरु को स्वयं का 'ब्राम्हण' परिचय दिलाया था॥

इस छलावे से भरपूर दुनिया में मेरा छोटा सा छल काम न आया था।

विद्या से परिपूर्ण होकर भी ज्ञान अधूरा रहने का श्राप गुरूसे पाया था॥

विद्रोह से भरे इस सूतपुत्र के मन को मित्र दुर्योधन ने शांत कराया था।

मेरे गुणों को परख कर उसने अंग देश का सिंहासन मुझे दिलाया था॥

युद्ध में निस्वार्थी रहकर मैंने मित्रता और कृतज्ञता धरम निभाया था।

वहाँ भी कुंती माँ ने पाण्डवरक्षा वचन लेकर निजपुत्रों को बचाया था॥

दानवीर मैं शूरवीर मैं गाण्डिवधारी से सरस धनुर्विर सदा कहलाया था।

फिर कहाँ चूक हो गयी गोविंद जो युद्ध में देवों ने मिलकर छलाया था॥

तेजपुँज आँखे झुकाकर माधव बोले जब कर्णान्त निकटतम आया था।

कौन्तेय तुम जानो जीवन का मर्म मैने भी नियति से युध्द चलाया था॥




जन्म मेरा भी था अनचाहा मामा का कैदी बना संसार में मुझे लाया था।

मैं भी नदी में बहकर दूर देस था पहुँचा पिता ने नंदराज को सौपाया था॥

दूसरी माँ ने पाला-पोसा जहाँ मैं भी अन्त में तुम सम शब्दश: 'पराया' था।

मामा मासी शब्द 'माँ' को धारण करते उनसे ही विश्वासघात को पाया था॥

बचपन से दानवों से लढता आया यौवन भी कहाँ सरलता से बिताया था।

तुमने तो प्रेमिका से विवाह रचा कर्तव्यपथ ने मुझे राधा से बिछडाया था॥

सूतपुत्र होकर भी तुम्हे राज्य मिला अन्गदेश का जिसे तुमने चलाया था।

राजपुत्र होकर भी मैं कहाँ सिंहासन बैठा आजीवन राजा न बन पाया था॥

प्रारब्ध का मारा मैं भी तो था पर स्वयं को कभी प्रतिशोध में ना जलाया था।

तुम्हे सगी माँ ने शपथ से घेरा मैने शिशुपालरक्षा वचन सौ बार निभाया था॥

जन्मा मथुरा से वृन्दावन फिर मथुरा फिर द्वारका भाग्य ने ऐसा सताया था।

भगवान का पथ भी सीधा-सरल नही राधेय बस यही जग को बताया था॥

तुम दानवीर तुम शूरवीर पराक्रमी तेजस्वी तुम में एक ही दोष समाया था।

संगति तुमने गलत चुनी थी हे वृष दुर्योधन ने स्वार्थ में राज्य थमाया था॥

उपकार के बोझ तले सदा रहकर तुमने नीती और राजधर्म को गलाया था।

कौरवों के अधर्म को मूकसंमती देकर अपने ही अध:पतन को बुलाया था॥

स्मरण रहे कि जो अन्याय हुआ उससे तुमने विद्रोह का मार्ग अपनाया था।

स्वयं के साथ अनुचित होने पर भी अड़िग रहा जो वही राम कहलाया था॥

अन्त्य समय में उपदेश मिलने पर कर्ण का मन पश्चात्ताप से भर आया था।

मार्गदर्शन मिल रहा था उसे जिसके लिये नियति ने जीवनभर तरसाया था॥

सुनकर वह हितकारी वाणी सुर्यपुत्र ने श्वासों का अंतिम बाण चलाया था।

अपने गुणों से तुम सदा अजरामर रहोगे यह केशव ने विश्वास दिलाया था॥


By Neha Mahendra Jain




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