तेल का कुआं
By Pragya Rathi
तेल का कुआं
घोष -
"कुएं खोदन की भीड़ंत लगी है
बूता आज़माना है
माटी संग बनकर माटी
सोता भाग जगाना है ।"
मुझे कुआं खोदकर तेल निकालना था
काला तेल मेरे जीवन में उजला ला सकता था ।
सब लोगों ने कुएं खोदे और जीवन को सुंदर बना लिया
मेरी देह कोमल थी ।
खुदाई से हाथों में पीड़ा होती
देह की पीड़ा से धैर्य खोता ।
मेरा उजला रंग मिट्टी होता ।
कुढ़ते मन के प्रयासों से मैंने असफलता ही पाई
दंड स्वरूप हिस्से में काल कोठरी आई ।
मुझे बंद किया गया
काली दीवारों के कमरे में
मैं रोती रही
निराशा में खोती रही
विश्राम , विराम बन गया ।
डर से जीवन मर गया ।
आँखों का पानी सूखा , सपनें प्यास से मर गए
पथराई आँखे बंद होना चाहती थी
लेकिन साँसों ने आँखों से विद्रोह कर कहा
तुम बंद हो जाओ , किन्तु मैं गतिमान रहूंगी
साँसों की बातें हृदय ने सुन ली
वो तेजी से धड़कने लगा
शरीर के हर अंग ने साहस जोड़ना शुरू किया
कर्म के साथ मृत्यु आए
देह यहीं पुकार लगाए ।
मैंने कुआं खोदना शुरू किया
मुझे तेल निकालना था ।
जो मेरी रिहाई की कीमत थी
मैंने दिन को रात समझ खुदाई की
रात को दिन समझ खुदाई की ।
मैं मृत काया थी
मैंने अपनी कब्र की खुदाई की ।
घावों पर चुभते मिट्टी के स्पर्श से देह कठोर होने लगी ।
कोमलता, कर्म में खोने लगी
देह की दुर्गन्ध पर नाक ने व्यंग ताना -
कैसा मोह तूने पाला
मंथर देह का हुआ मुंह काला ।
अंततः तेल नहीं निकला
गति, स्थिरता से हार गई ।
अब अंग विद्रोह नहीं कर रहे ।
अब सब शांत हो गए ।
अब हर अंग धरा पर मृत पड़ा था
केवल आंखें खुली थी
जो गड्ढे पर गड़ी थी ।
तेल निकलने की आस समाप्त हो चुकी थी ।
तभी आंखों को लौ भर प्रकाश ने मूंद दिया ।
आंखों ने फिर खुलने का साहस जुटाया ।
गड्ढे से आता प्रकाश , निर्जीव पड़े सजीव को देख रहा था ।
मेरे सामर्थ्य को अर्थ मिल गया था ।
मेरी खुदाई सुरंग बन चुकी थी ।
मैंने सुरंग खोदी ।
मैं समझ गई , मेरा जन्म ( तेल रूपी ) कब्र के गड्ढे खोदने के लिए नहीं हुआ था ।
( सुरंग रूपी ) नए मार्ग बनाने के लिए हुआ था ।
मैंने रिहाई की राह खोज ली थी ।
By Pragya Rathi

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