तेरे नाम।।…
By Abhimanyu Bakshi
लफ़्ज़ों की सौग़ात से पयाम कर रहा हूँ,
याद तेरे संग बिताई वो शाम कर रहा हूँ।
अक्सर ख़्वाबों का हुजूम तेरी चौखट से टकरा जाता है,
इस मुठभेड़ की आवाज़ को कलाम कर रहा हूँ।
नादान दुनिया को तो बुलंदियों तक जाना है,
मैं तुझ तक वापिस आने का इंतज़ाम कर रहा हूँ।
शाम ढले तो उसी पलंग पर जाकर सोना है,
यही सोचकर मैं अपना काम कर रहा हूँ।
आसमाँ तो वही था जो तेरे शिखर से दिखता था,
वो नीली चादर है जिसे हर सुबह सलाम कर रहा हूँ।
वो फ़िज़ा तेरी थी जिसने मुझे ये सौग़ात बख्शी,
आज तुझे ही भेंट तहरीरें तमाम कर रहा हूँ।
तू ये न सोचना महलों में मेरा दिल बस गया है,
ज़हनी तौर से आज भी उसी चादर पर आराम कर रहा हूँ।
इस तरक़्क़ी के दौर में वो मेरी पहुँच से दूर न निकल जाए,
या ख़ुदा वो पुराना घर तेरे नाम कर रहा हूँ।
By Abhimanyu Bakshi

Comments