तेरी तलब
By Preeti Bansal
कुछ ऐसी बेहिसाब लगी है तलब तेरी,
मेरा हर ज़र्रा चाहे सिर्फ चाहत तेरी।
कुछ यूं समाले मुझे अंदर तेरे,
भीगती जाऊ तेरी मोहब्बत तले।
हर पल, हर लम्हा, हर घंटा, हर दिन, हर रात,
हर हफ्ता, हर माहिना, हर साल
मेरा सब सिर्फ तुझमें हो,
तेरी तलब बस मुझमें हो।
छू ले, जी ले मेरे रोम रोम को,
सिर्फ तेरी तलब ही छेड़े मेरे तन मन को।
तेरी तलब तेरा प्यार जन्नत दे गया,
हमारे प्यार के इस एहसास को इबादत बना गया।
ये इबादत भी तेरा ही नशा है,
मेरे जीने की बस तू ही इक वजह है।
अब किसी नशे या सुरूर की चाहत नहीं है,
बस तेरी ओर जाती एक राह चाहिए,
तू ही आदत, तू ही इबादत, तू ही जरिया, तू ही इबादत।

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