तेरी जिदंगी में मुफलिसी का कोई दौर नही आया।
By Bhagawan Bose
तेरी जिदंगी में मुफलिसी का कोई दौर नही आया।
इसीलिए तेरी नजरो में मेरा कुछ और नही आया।
हमने तो झेल रखे है बर्बादी के हजारों मंजर,
तभी तो तुम्हे झेलने में मुझे कोई जोर नही आया।
जलसे में लगी थी कतार हजारों गीतकारों की।
मगर मेरे कानो में किसी नग्मे का शोर नहीं आया।
जंगल में सजी वो महफिल भी अधूरी रह गई,
क्योंकि सब आ गए , पर एक मोर नही आया।
बादलों ने रची थी साजिश, चांद छुपाने की। रात तो हुई, मगर अंधेरा घनघोर नहीं आया। सुना था गली के एक छोर पर हैं तेरा मकान, चल रहा था उस गली में, मगर वो छोर नही आया। एक मुद्दत से मशगूल था तेरे ख्वाबों में, सिर्फ ख्वाब ही रहे, हकीकत का कोई दौर नही आया। छोड़ दिया अब घर के चोखटो को तालो में बंद रखना, खुले किवाड़ों में भी तेरे नाम का कोई चोर नहीं आया। इस कद्र बदनाम किया तुमने मेरे हालातो को। कि मेरे जनाजे में मेरे सिवाय कोई और नही आया।
By Bhagawan Bose

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