तेरा ज़िक्र
By Sonali Arora Malik
सोच रही थी एक दफा
जिसने सुखी जीवन दिया, कुछ समय उसका भी तो बनता है
समय निकालकर आल्सय त्याग कर, शुक्र करना तो बनता है
पर इस इंसानी फितरत ने रंग दिखा ही दिया
रब को याद तो न किया, उसे भुला ही दिया
फिर भी वह मिलने आया, पर में वहाँ न थी
दुनिया से उलझती इधर-उधर जूझ रही थी
सोच मेरी यह बस सोच बनी रह गई
स्वार्थी है तू रूह मेरी कह गई
दुख जब दस्तक देगा, उसकी ही याद दिलाएगा
याद उसे जो करता, तो दुख कहे को आएगा
By Sonali Arora Malik

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