तू गिर, तू उठ
By Batulzakirhussain
तू गिर, तू उठ न हर मनना है तू संभालेगा फिर गिरेगा यही तू ज़माना चाहता है लोग चाहे लाख तुझसे कहे तुझे सुनना नहीं है अपनी मंजिलों तक तुझे खुद ही आगे बढ़ना है
ये सितम तू आपने आप पर ना कर तू दुखी ना हो मन को उदास ना कर तू खड़ा होगा फर चलेंगे दोड़ना भी तुझे है लोग तुझे खिचेंगे आगे भी गिरायेंगे हार न मनना न उम्मिद होकर फिर उठना नई जिंदगी की रोशनी लेकर ।
By Batulzakirhussain

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