तू खुदसे क्यूँ नाराज है?
By Sanchita S K Behera
माना कुछ टूटा सा एक तारा तू,
माना की है तू बेकस मगर,
ना समझ खुद को बेबस तू।
दुनियां के इस शोर में तू जो गुमसुम रहता है,
टूट-टूट कर संभला तू फिर क्यूँ टूटने से डरता है?
राह में तेरे मंजिल तक की अनगिनत मुश्किलात आएंगे,
पर टुकड़ों में बंधी तेरी हिम्मत देख बेमतलब सा खुद को पाएंगे।
क्यूं शोर से तू इस डर रहा, तेरे हर बुलंदी का ये आगाज़ है,
तो आवाज़ बन तू इस शोर में, तू खुदसे क्यूं नाराज है?
तेरी ये जो चाह है की हासिल हो हर मकाम तुझे,
पर देख जरा नज़रे उठाकर, बस इतनी सी आस में
कितने ही खोए तूने हासिल मंजर,
ये जो सबके शोहरतो में तूझे मकाम दिखा है,
तूझे क्या पता इसे पाने में उसने कितना कुछ खोया है।
तो खोकर कुछ पाने में भी एक सुकून होना चाहिए,
शोहरत के इस आड़ में भी इमान सच्चा चाहिए।
चाहे वक्त लगे, बेवक्त ही सही, मंजिल मिलने का ये आगाज़ है,
तुजुर्बा बड़ा होगा उस मंजिल से, तू खुदसे क्यूं नाराज़ है?
खुदको तू चराग समझ, क्यूं बूझने के डर में रहता है?
कही खुद का वजूद खो ना दू, क्यूं ये बातें सबसे कहता है?
तू लौ नही, रोशनी है तू
गर्द अंधेरे सवालों का, सबब है तू
आज़ाद उस आफताब सा, हर दिन का तू आगाज़ है
तू ना कभी बुझ सकेगा, तू खुदसे क्यूं नाराज है?
क्यूं सुनता है उसकी बात को तू,
उसने कहाँ जाना तूने जो सहा है,
तूने उस जंग में क्या खोया है,
तूने इस जंग में क्या पाया है?
अगर होगा भी वो तेरी जगह,
तुझसा हर मुश्किल ना रोंध पाएगा,
समझदारी का इशारा फिर वो तुझमें ही देख पाएगा।
दुनियाँ के दिए चोट का, मरहम क्यूं तूने दुनियाँ में खोजा है?
है सुकून तुझ में तेरा, तू तेरा ही आगाज़ है,
फिर बता आखिर क्यूँ खुद से तू नाराज़ है?
By Sanchita S K Behera

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