तुम्हें चाहने की कोशिश में ख़ुदको यूं भुला देते हैं
By Sanchita S K Behera
तुम्हें चाहने की कोशिश में ख़ुदको यूं भुला देते हैं,
की किसी और को चाहने कि चाहत ही ना बचे।
ख्वाब कहूं तुम्हें या हकीकत ये भी समझ में आता नहीं,
क्यूकि एक ख्वाब था,
जो शायद किसी सहफे में लिखा था मैंने,
की कोई फिजूल सी बातों से मुझे डराए नहीं,
मैं अगर उड़ना चाहूं भी तो वो डगमगाए नहीं ।
मेरे ख्वाब सुने और खुदके ख्वाब सुनाए भी,
सहम जाऊँ अगर किसी बात से में तो,
खुदमें मुझे समाए भी।
मैं रूठूं तो मनाए भी,
गलतियों पर मेरी चिल्लाए भी।
कभी जो ना मानू में अपनी गलती को,
तो वो नादानी समझकर मुझे समझाए भी।
और तुम जो लिखा था वैसे ही हो,
ना ज्यादा ना कम,
जैसे कभी अगर सोचा था ठीक वैसे ही,
तुम्हारा हाथ पकड़ना किसी नायाब ख्वाब से कम नहीं है,
ना ही तुम मेरे किसी ख्वाइश से कम हो।
बस अब तुम्हारे साथ चलना चाहती हूं,
बिना तुम्हारा हाथ अपने हाथों से छुड़ाए,
क्योंकि सिर्फ हाथ पकड़ना ज़रूरी नहीं,
ज़रूरी है उन थामें हुए हाथों को ज़िन्दगी भर थामें रखना,
या फिर यूं कहो ज़िन्दगी के बाद भी ।
By Sanchita S K Behera

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