तुम्हारी याद नहीं आती
By Ankeet Shome
अरे माँ, सुनो ना, अब तुम्हारी याद नहीं आती।
तुम बार बार ये पूछा मत करो, अपना ध्यान मैं खुद रख सकता हूं।
कभी बिना खाये ही अगर घर से निकलता हूं तो, रास्ते में, भीड़ में, धक्के ही खा लेता हूं मैं।
कभी नींद से समय पे उठ नहीं पाया तो ही हुआ, देर से जाने पे ऑफिस (office) मे एक दो डांट ही खा लेता हूं मैं।
पापा, सुनो ना, वो क्या है कि, कभी कभी सैलरी (salary) जो है, वो महीने के खत्म होने से पहले ही खत्म हो जाती है।
आपको तो पता ही है, सम्भाल लेता हूं मैं महीने को। पर फिर भी तुम्हारी याद नहीं आती।
अब ना ही खेलता हूं, ना ही चोट लगती है और ना दर्द होता है।
इसलिए आपकी मरहम-पट्टी की जरूरत तो पड़ती नहीं है और याद आपकी आती नही है।
पर वो जो दिल टूटा था ना, तब बहुत दर्द हुआ था। वो ज़ख़्म अभी तक भरा नहीं है, ये तुम्हे बताया नहीं है क्यूंकि अब तुम्हारी याद आती नहीं है।
पता है रितेश, हम स्कूल में बेस्ट फ्रेंड्स (best friends) हुआ करते थे। पर अब तुम्हारी याद नहीं आती।
ऑफिस (office) जाते हुए, बस (bus) में, ट्रेन (train) में कई लोग मिल जाते है। उनसे बस 'हाई, हैलो' ('hi, hello') हो जाती है।
अब इतनी दोस्ती तो काफी है ना, बस इसलिए तुम्हारी याद नहीं आती।
यारी-दोस्ती पे इतने मूवीज (movies) और सीरीज (series) देख लिये है के दोस्ती वही जी लेते है और तुम्हारी याद नहीं आती।
पर दिनभर ऑफिस (office) मे खटने के बाद जब कमरे में लौटता हू ना, तब उस अनजान शहर मे, उस खाली कमरे मे, उस सुनसान रसोई मे, उस अकेलेपन मे,
माँ, पापा, रितेश तुम सब को याद नहीं करता हू, तुम लोगों की याद आ जाती है।
जब पहली नौकरी करने शहर से दूर निकला था, ना कोई जवाबदेही, ना कोई जिम्मेदारी ये सोच के निकला था।
ना करूंगा किसी को याद, ना आयेगी किसी की याद, कामाएंगे खूब पैसे, करेंगे रोज़ पार्टी (party), डालेंगे रोज़ फोटो फेस्बूक (Facebook) पे, बनाएँगे कितने ही दोस्त।
पर अब 10 महीने हो गये इस नये शहर मे, ये ऑफिस (office) का काम है के कभी ख़तम ही नहीं होता।
ऑफिस (office) मे अच्छे कॉलीग्स (colleagues) तो मिलते है, पर अच्छे दोस्त नहीं बनते।
माँ तुम्हें झूठ केह देता हू के “हा खाना खाया, चलो अभी फोन (phone) रखो बहुत काम है”।
पापा ये जो मैं केहता हू ना के “हा सब सही चल रहा है ऑफिस (office) मे”, नहीं है सही। बहुत प्रैशर (pressure) है।
और रितेश तुमसे इसलिए बात नहीं करता हू ना क्यूकी लाइफ (life) मे कुछ हैपनिंग (happening) है नहीं यार बताने को।
पर क्या दोस्त से बात करने के लिए लाइफ (life) हैपनिंग (happening) होनी जरूरी है।
ये मूवीस (movies) और सिरीज़ (series) से भी अच्छी, रितेश, हमारी वाली दोस्ती है।
ये 'हाई, हैलो' ('hi, hello') वाली नहीं असली वाली दोस्ती है हमारी।
क्या होगा अगर पापा से केह दू के बहुत प्रैशर (pressure) है ऑफिस (office) के काम मे।
और ये के सैलरी (salary) इस बार भी पहले ही ख़तम हो गयी है।
और ये के 2 ब्रेकअप्स (break-ups) हो चुके है, और उसका दर्द अभी भी है ।
और माँ, सही मे तुम्हारे जैसा घर का बनाया हुआ स्वादिस्ट खाना, यहा कही नहीं खाया।
वो चैन की नींद जो तुम्हारे गोद मे आती थी, वो अब कहा। अब सोता तो हू पर नींद कभी पूरी ही नहीं होती।
ये सब कुछ तुम सब से कहना है, और ये भी के "तुम्हारी बहुत याद आती है, तुम्हारी बहुत याद आती है"।
By Ankeet Shome

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