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तुम रुको पल जरा

Dec 7, 2022
2 min read

Updated: Dec 14, 2022

By Vishal Raj Amaresh




तुम रुको पल ज़रा चांँद जगने तो दो,

आसमाँ पर अभी है मेघ की सिलवटें,

शुक्ल शुचि जड़ी छिपी तारों की बूटियाँ,

अंश-अंश तुमको दर्पण में भर लें ज़रा।


कल का दिन था मेरा गुज़रा रंगों भरा,

खबरें पाईं कि तुम हो शहर में इसी,

त्वरा की हर घाट छानी न पानी मिला,

मीन सी थी तड़प पर यादें मरने न दें,

स्वप्न के घात से दिन था मेरा सना

इन्द्रियों के समस्त बल थे गिरते गए,

आँखें देखती थी तेरी थे केश छूते मुझे,

उलझे बेलों सा मैं तेरी खुशबू समोया हुआ

दृश्य के ओट में घूँघट किए भावना,

रात दर्शन को इतना था व्याकुल रहा,

स्याही से स्याह की हमने कागज़ बहुत,

तेरे नाम भरे अक्षरों को ही छूती रही उंगलियाँ,

धूल कण बन गईं,सब प्रथाएँ विगत,

तुम्हारे आभास के ध्रुव का वर्तुल विकल,

भेदती ही गईं सब अटकने साँस की,

मैं जिया ही नहीं जिंदा रहते हुए।


अब के आ गई तो देखो सजा ये चमन,

श्रुतियाँ गा रहीं झींगुरों को सुनो,

हवाओं को खेलने की स्पृहा तुम बनी,

मेघ हटने लगें,आसमाँ देख लो,

ठाँव पथ अड़ चुके हैं लगें डोलने

जुगनूओं के उजाले हैं तुम्हे रोकते,

रातरानी के फुलों को खिलने तो दो,

देख लो अब तलक रात जागा नहीं,

यूँ कहाँ चल दिए,तुम तो बैठे रहो।





चलो बातें अभी से अभी की करूँगा,

परीचायक रहेगा ये केवल नयन,

तुम्हारे उलझन के सोपान की लें बलाएँ,

खुद ही उसकी डगर पे मैं चढ़ता चलूँगा

सैर पर झील के उसी तीर पर हम चलें,

वहाँ तैरता एक नाव अकेला तुम्हे ढूँढता,

तुम्हारे स्वप्न-नगर की सदी जा चुकी,

रास्ते बन चुके हमसे तुमसे जुदा,

तुम्हारे देखें हुए,तुम बिना कम हुए,

अब भी कई लोग ऐसे हैं रहते यहाँ,

तेरे पैरों की चोटों से हँसता था जो,

तुम्हारे आँगन की सुध ढूंढती वो कदम,

हर ऋतुओं में बंधी है तुम्हारी अटखेलियाँ,

बैठ पीपल की डालें झुलाती थी तुम!,

घेर उमड़ी है अब अथाह स्मृतियाँ इन्हें,

जैसे पिछले जनम के इनको अपने मिलें।


अब निकट व्यर्थ के तुम चयन मत करो,

थाम हाथों में हाथ संग मेरे चलो,

देखो पत्थरों ने गिने हैं रखे सील कर

तुम्हारे घर रास्ते वही झील का ये शहर,

ये आँगन ये लोगों की आबादियाँ,

इन ढली उम्र के इन ढले आँख में

रुक के देखो ज़रा अपनी परछाइयाँ

तुम्हारे किस्से ये सब हैं मौसमों की जतन,

नए फूलों ने सुन के बिताई थी पूरी हुई।


अब सफ़र बाट लूँ या की रोकूँ तुम्हें,

एक मोह की अगन और मंज़िल अलग,

इसी उलझन में रमे,अंक में पीर भर,

भोर कि अरुण में अब चलो छोड़ दूँ।

By Vishal Raj Amaresh













































































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