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तुम बातें समझा करो........

Dec 19, 2022
2 min read

By Sanchita S K Behera


कुछ लोग ज़िन्दगी के मोड़ पर मिल जाते हैं,

पर हम उन्हें यूं ही समझ कर भूल जाते हैं।

लेकिन किसी का मिलना यूंही नहीं होता,

हर किसी का अपना एक किस्सा होता हैं,

बस बताने से वह कुछ कतराता हैं।

शायद सोचता हैं,

तुम अपनी दुनियां में मसरूफ हो,

तो फ़िर हो सके तो इस मसरूफी से रिश्ता काटा करो,

तूम बातें समझा करो।


शायद वो तुम्हें देखकर सोच रहा होगा,

जिसका हाथ छू कर मुझे पनाह मिल जाए,

उस हथेली पर में अपना घर बना लू।

जिसकी सादगी देखकर मुझे सुकून मिल जाएं,

उस सादगी के सहारे एक आशियाना बना लू।

लेकिन वो तुमसे ये बातें कहने से कतराता हैं,

शायद सोचता है, तुम अपना हाथ बढ़ा नहीं सकोगे।

तो फिर हो सके तो वो सादगी तुम अपनाया करो,

तूम बातें समझा करो।





शायद वो आइना देखकर तासल्ली करता हो,

की इस दुनियां में उसे जानता हैं कोई।

पुराने बरामदे में आयी नई धूप को देखकर सोचता हो,

की उसे पहचानता है कोई।

लेकीन अकसर उसे आईने से बात करने में परेशानी होती होगी,

आखिर बरामदे की धूप भी तो शाम तक चली जाती होगी।

तो फ़िर हो सके तो जो जिंदगी भर रहे वो रोशनी जगाया करो,

तूम बातें समझा करो।


वो शायद आसमान सा हो,

आसमान जो रो पड़ता है जमीन की याद में,

और भेजता है बारिशें सौगात में

पर उन बारिश कि बूंदों की कहानी कौन जानता है?

अपने सफर में जो खुले खिड़कियों से झाकते उन नजरों को ढूंढती है,

वो नजरे, जो भीग जाने के खयाल से दरवाजे बंद नहीं करती हैं,

आखिर वह बुंदे भी तो आंसुओं को छुपाने में मदद करती हैं।

खैर.... जानते हैं तुम्हारा वक्त तुम्हारा हैं,

लेकिन इन्हें देखकर भी ना देखना कहा तक गवारा है?

आखिर ये बूंदे भी तो हर मौसम नहीं आया करती हैं,

तो फिर हो सके तो तुम उन बूंदों का इंतज़ार करनेवाली नजरे बनने की कोशिश किया करो,

तुम बातें समझा करो।



शायद वो उन अनकही बातों सा हो,

बातें, जो पयाब हो या फिर गहरी हो,

बातें, जो अच्छे-बुरे वक्त से मिलकर अयी हो,

लेकिन उन बातों को किसी ने सेहफे में लिखकर लिफाफे में कभी ना खोलने के लिए बंद कर दिया हो।

अगर वो इन बातों सा हैं तो फिर तुम हो सके तो,

उन बातों को जानने की ज़िद किया करो,

तुम बातें समझा करो।


By Sanchita S K Behera





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