तुम पर मेरा पहरा है
By Kavita Bhatt
दूर क्षितिज में कहीं
आसमान की सारी सीमाएँ लाँघ
मैं प्रतिबिम्ब तय करता हूँ दूरियाँ सारी I
तुम सूरज मैं प्रतिबिम्ब तुम्हारा I
शाश्वत तुम सदा से थे मुझ में स्थापित
वक्त की हर सीमा से पिघलकर
मैं करता हूँ चित्रित तुमको
तुम जीते हो हर वो रंग
एक बार नहीं अपितु असंख्य बार
जिस जिस कण से मैं टकराया
तुमने खुद को जिया कई बार !
तुम सूरज और
मैं प्रतिबिम्ब तुम्हारा
शाश्वत तुम सदा से थे
मैं हमेशा से बिखरा था
सिमट जाता हूँ जब जब
तुझसे टकराता हूँ
वक़्त के आवर्तन से
हर क्षण क्षण में
बनता है नया अस्तित्व मेरा I
मैं प्रतिबिम्ब तुम्हारा
तटस्थ फिर भी तुझ जैसा
स्निग्ध करता है एक एक भाव तेरा
जब जब तू धरा पर
स्वयं को बिखेरता है
मुझमें खुद को खोकर
देता हूँ तुझको मानों
कोई साक्षात्कार नया I
सूरज –
मैं तेरा वजूद दुनिया कहती है ऐसा पर मैं सूरज तुझमें जीता हमेशा मैं जड़, कठोर एक सीमित परिधि में मेरी हर इक इकाई को छूकर मेरी ताप की सारी पीड़ा पीकर देता मुझको असीमित आयाम है तू मेरा प्रतिबिम्ब तुझसे टकराकर बनता मैं वक्त का "नया सूरज" हूँ I आभा मेरी निखरती तुझसे मैं तेरे कण कण में हूँ जल हो या फिर हो धरा या हो कोई अपरिमित आकाश तेरे सानिध्य से ही बनता हूँ पूर्ण मैं I मैं सूरज और तू प्रतिबिम्ब मेरा वक़्त की इकाई पर टूट-टूट कर, बिखर-बिखर कर प्रेम की अनंत लहरों से लड़कर तू मुझको देता एक अमूर्त रूप है ! नहीं बिखरती मेरी इकाई जब तक हूँ मैं तेरी परिधि में मैं सूरज तू प्रतिबिम्ब मेरा मैं नहीं हूँ तेरा वजूद हम दोनों तो हैं "शाश्वत अनंत प्रेम की परिभाषा कोई" मानो वक़्त के पहरे पर हम दोनों खड़े हैं हमेशा से जीने एक आलिंगन अपार I मैं सूरज और तू प्रतिबिम्ब मेरा!
By Kavita Bhatt

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