तुम क्या कर रहे हो
By Raj Modi
तुम क्या कर रहे हो?
तुम इतिहास ही तो लिख रहे हो
तुम बार बार लगातार एक विचार लिखो
तुम अलग अलग तरह से वही आम लिखो
नई नई कलम से मोटे से कागज़ पे लिखो
और पन्ने लिखो
गालिब और बुकोस्की, अपने मनसे लिखो
बेढंग, बेछंद ताव से अपना अज्ञान लिखो
बेमतलब शब्द घर्षण से व्याख्यान लिखो
और पन्ने लिखो
कृष्ण अल्लाह के ज्ञान की टीका लिखो
निच्चे के कुछ नही मानने पर कुछ लिखो
कत्ल ए आम पे शान से बड़ी वाह लिखो
और पन्ने लिखो
देशप्रेमी चमकती सूरत पे ठहाके तो लिखो
हंसते हंसाते जेल दर्शन के काव्यांक लिखो
कोसती, मरती, अधूरी सी पत्रकारिता लिखो
और पन्ने लिखो
मन में दूर दबे नीचे टेढ़े सत्य पे परदा लिखो
अपने आप को सबसे अलग बताओ, लिखो
नए ग्राहक को फुसफुसाए ऐसे अंजाम लिखो
और पन्ने लिखो
घर के पास की सड़क के अंत में बैठा हु,
सारे पन्ने लिख लिए हो तो लेके ही आना,
साथ में जलाएंगे और फिर कुछ बातें करेंगे।
By Raj Modi

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