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तलाश में

Dec 24, 2022
1 min read

By Shuaib Ahmad


सफर में हूँ हमसफ़र की तलाश में

दर्द में हूँ हमदर्द की तलाश में।


दवा तो मिल गयी है मेरे मर्ज़ की आखिर

हथेली पर लिये बैठा हूँ शिफा की तलाश में।


दीवानों सा हाल है जबां पर बस यही एक सवाल है

लकीरों में वो है ही नही तो फिर दुआएं है क्यों उनकी तलाश में।


क़लम बेचैन हो जाती है लिखने में उनको बेवफा

ये तो अल्फ़ाज़ है ना जाने क्यों उनकी तलाश में।


स्याह दिल है ये तो बस ज़िया मांगता है ऐसे

जैसे अंधेरी शब हो रोशनी की तलाश में।




इश्क़ में ना वो मुकम्मल हुए ना हम मुक़म्मल हुए

अधूरे से वो किसी के हो गये हैं अधूरे से हम भी किसी की तलाश में।


मजनू ,फरहाद, महिवाल ओ रांझा मुहब्बत आखिर मिली किसको

भटक रही है आज भी मुहब्बत, मुहब्बत की तलाश में।


ज़माना आशिक़ों की कद्र करता ही नही ये सच है

आशिक़ भी मगर कहाँ रहते है फिर ज़माने की तलाश में।


एक मुलाक़ात हुई उसमे भी वक़्त की पाबंदी हुई

घड़ी की सुइयां पागल है एक ओर मुलाक़ात की तलाश में।


कुँवर छोड़ो भी अब मुहब्बत मुहब्बत गुनगुनाना

आओ चलते है फिर से ज़िंदगी की तलाश में।


By Shuaib Ahmad



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