तमन्ना
By Sandeep Sharma
वक़्त बे वक़्त टोकना तेरा याद रहता है
सोते जागते हुए बस तेरा ही ख़्याल रहता है
लौटकर आएगा तू मेरे पास कभी पता नहीं
मगर बे-क़रार दिल को तुझसे ही क़रार रहता है
बुझ ना पाये मेरे दिये कि ये लौ
जलता है दिल मेरा और रोशन तेरा दर रहता है
मैं अब ख़ुद को भी समझा नहीं पाता हूँ
साथ रहकर भी ख़ुद को अकेला ही पाता हूँ
क्या ये सब मुझे सताने का नया तरीका है
जान लो मैंने ख़ुद को तुम्हारे लिए ही बदला है
तमन्ना है कि मैं तेरे साथ बूढ़ा हो जाऊं
काँपते हाथों की तेरे लाठी हो जाऊं
ओढ़ लूँ जिसे मैं सर्दी में तुम वो कम्बल हो जाओ
मैं धधकते सहरा में बरसता बादल हो जाऊं
साफ लफ़्ज़ों में इज़हार कर नहीं पाऊंगा
ज़रा ये तो सोचो बिछड़ कर तुम से कैसे जी पाऊंगा
दिल मेरा अब मंदिर में गूँजे नाक़ूस सा लगता है
मस्जिद से जैसे सुबह की मुक़द्दस अज़ान लगता है
मिट गयी हैं नफ़रतें सारी मोहब्बत का राज हो गया है
मन मेरा अब सीता का राम मीरा का घनश्याम हो गया है
By Sandeep Sharma

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