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डायन का आशीर्वाद

By Sia Mishra


आज से कई वर्षों पहले, सात समुंदर पार, एक पर्वत-श्रृंख्ला के उस पार, एक छोटी नदी के किनारे एक छोटा-सा प्रदेश था। वहाँ के राजा बहुत दयालु थे और अपनी प्रजा से बहुत लगाव रखते थे। बस वे एक ही बात से चिंतित रहते थे कि उनकी कोई बेटी नहीं थी। 

सात, सुंदर, रेशमी बालों वाले बेटों के बाद जब राजपरिवार में एक बेटी जन्मी तो राजन खिल उठे। बेटी सुंदर थी, पिता की आँखों की परी थी। परंतु किसे पता था कि  वह इंसान का रूप धारण किए हुए एक डायन थी। यह बात तब तक छिपी रही जब तक सात बेटों के सात घोड़ों को कोई एक-एक करके मारने लगा। 

वह दिन भर एक प्यारी लड़की के रूप में रहती, रात के बारह बजते ही एक तलवार लेकर अपने रूप में आती, एक घोड़े का सर धड़ से अलग कर देती और खून पीकर फिर से इंसानी लड़की का रूप पकड़ लेती। सबसे छोटे भाई, राजकुमार ने रात को अस्तबल पर पहरा देने की सोची। उसकी आँख लगने ही वाली थी कि तभी उसने अपनी बहन को यह कांड करते हुए देखा। 

“पिता जी, कहना मानिए, छोटी ही हमारे घोड़ों का गला काटकर उनका खून पीती है। ” 

“तुम्हें अपनी छोटी बहन पर ऐसा आरोप लगाते हुए लज्जा नहीं आती?” 

“आप आज रात को मेरे कमरे की खिड़की से खुद ही देख लेना।” 

राजा को विश्वास  ही नहीं हो रहा था परंतु अपनी आँखों के सामने यह देखकर वे भौंचक्के रह गए। 

“मैं अब  इस घर में नहीं रहूँगा” राजकुमार ने प्रतिज्ञा ली। राजा कहाँ उसे रोक पाते? छः घोड़ों की हत्या के बाद वह अपना घोड़ा लेकर अगले दिन पौ फटते ही चला गया। 

उसे गए हुए बहुत वर्ष बीते या कुछ ही, यह तो कहना मुश्किल होगा परंतु, घर का छोटा बेटा अपने परिवार का हाल-चाल लेने एक दिन प्रकट हो गया। भैया को देखकर बहना बहुत प्रसन्न हुई; बोली “भैया, आप मेरे बारे मे गलत न सोचें। आपको कोई गलत फ़हमी हुई है।  माँ-बाबू  के चल बसने के बाद सारे भाई मेरा ब्याह कराकर बाबू की थोड़ी संपत्ति मुझे देकर और बाकी की लेकर अलग-अलग शहरों में व्यापार करने चले गए। मेरे पति आते ही होंगे, बाज़ार गए थे। आप यह लुटिया लेकर इसे चम्मच से बजाते रहिए, मैं खाना बना लाती हूँ।” यह कहकर वह झट से रसोईघर में घुस गई। राजकुमार ने सोचा, “लगता है मैंने जल्द-बाज़ी में अपनी ही बहन को गलत समझ लिया। हो सकता है कि उस दिन जो भी मैंने देखा, वह मेरी आँखों का वहम था।”   

भाई लुटिया बजाने लगा। इतने में दीवार में बने एक बिल से एक चुहिया बाहर आई। “राजकुमार, यह झूठ बोल रही है।” राजकुमार इस चुहिया को पहचानता था। यह बचपन से उसके साथ खेलती थी। वह बोली “आपके जाने के बाद वह महाराज को खा गई और अपनी माँ को भी नहीं छोड़ा। उसके चुड़ैल होने से बेखबर भाइयों ने उसकी शादी करवा दी तो वह दूल्हे को खाने के बाद अपने सारे भाइयों को भी एक-एक करके खा गई।” यह सुनकर राजकुमार का कलेजा छलनी हो गया। चुहिया बोली “आप ओखली में सर न डालें। वह रसोई में खाना नहीं बना रही है, वह आपको गलाने के लिए तेल गरमा रही है। मैं अपनी पूँछ से लुटिया बजाती हूँ , आप भाग जाइए।” 

“मतलब मैंने कुछ गलत नहीं समझा ।” 

चुहिया की बात सुनकर वह जाने ही वाला था कि तभी चुहिया ने कहा “उसे अपने पीछे देखकर डरना मत, उसे अपने पीछे खूब दौड़ाना। वह थकने के बाद अपनी शक्तियों का प्रयोग नहीं कर पाएगी।” राजकुमार चुहिया का धन्यवाद करता है और अपना घोड़ा लेकर भाग जाता है। बहन रसोई से आवाज़ लगती है, “भैया, लुटिया बजा रहे हो ना? खाना बनाने में थोड़ी देर हो गई तो चले तो नहीं गए?” चुहिया उत्तर देती है “हाँ छोटी, बजा रहा हूँ।” डायन तुरंत समझ जाती है कि यह उसके भाई की आवाज़ नहीं थी। बहन आकर देखती है कि चुहिया लुटिया बजा रही थी। वह चुहिया को खाने दौड़ती है। पर, चुहिया अपने बिल में घुसकर हँसने लगती है। तभी उसे घोड़े के दौड़ने की आवाज़ आती है। वह एक साए का रूप लेकर भागती है। इधर राजकुमार अपना घोड़ा एक पेड़ से बाँधकर एक डाली से दूसरी डाली पर कूदने लगता है। चुड़ैल बहन उसे पकड़ नहीं पाती और आखिरकार थककर चूर हो जाती है। तब भाइ अपना घोड़ा लेकर भागने लगता है। “भैया रुको, बात सुनो!” 

“मैं नहीं रुकूँगा।”

 “अच्छा, तो एक बात सुनते जाओ। तुमने मुझे हरा दिया है। अब तुम कोई भी खेल खेलना या शर्त लगाना तो मन में ‘मैंने पाया डायन का आशीर्वाद’ बोल देना। तुम जीत जाओगे।” 

राजकुमार हमेशा के लिए दूसरे शहर चला गया। अब चाहे वह अन्य पुरुषों के साथ कोई खेल खेलता या फिर किसी के साथ कोई शर्त लगाता, हमेशा जीत उसी के हाथ लगती। इस तरह उसकी पाँचों उँगलियाँ घी में हो गईं। एक दिन उसके दोस्तों की बीवियाँ उसकी बीवी से पूछने आईं – “तुम्हारे पति हमेशा कैसे जीत जाते हैं?” वह बोली कि पूछ के बताएगी। अब तो उसके मन में भी यह राज़ जानने की जिज्ञासा उत्पन्न हो गई। 

“नहीं-नहीं, मैं नहीं बताऊँगा। तुम औरतों की आदत होती है, इधर की बात उधर और उधर की बात इधर करने की।”

 “आपको बताना ही पड़ेगा। अपनी पत्नी से कोई बात छिपानी नहीं चाहिए।” 

अब वह ज़िद पर अड़ गई। अंत मे राजकुमार को पूरी कहानी बतानी ही पड़ती है। वह कई महीनों तक चुप रहती है पर एक सहेली के बार-बार पूछने पर वह अपना मुँह खोल ही देती है। असर यह होता है की राजकुमार हमेशा हारने लगता है। डायन के आशीर्वाद का असर खत्म हो जाता है। 


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