"टूटता हुआ तारा मेरा बचपन"
By Saniya Kher
वो खुशियों का संसार था
जीवन की बहार था।
कुछ ऐसा ही था मेरा बचपन टूटते हुए तारे सा।
जो मांगो मिल जाता था।
नन्हे से दिल के अंदर कांटों में भी फूल खिल जाता था
मुकाबले की ना कोई आस थी,
पैसों की ना कोई प्यास थी
बस जीने के लिए काफी एक सांस थी
ना जाने कब हो गए हम बड़े
काट दिए हमने वो पैड जो थे कभी खड़े।
शरारते कब साजिशों में बदलग्यी
वो मासूमियत भरी दुनिया ना जाने कहा आगे निकल गई।
बचपन में जो खाते थे गन्ना खेत का,
आज उसे बना दिया हमने रेत का ।
बचपन मे कैसे भी थे दोस्त...
उनसे हार जाने पर हम नही समझते थे मात!
पर जब छूटा वो बचपन ,
दोस्त बनाए हमने देख कर ज़ात।
शरारते करते हैं साजिशे तो नहीं
इसलिए बच्चो पे बरसता है नूर
ये बचपन के बाद मिली समझदारी
ले आई हमे इंसानियत से कोसो दूर
पर याद रहेगा मुझे ज़रूर,
बचपन था एक टूटता हुआ तारा।
जो चला गया अब कही दूर।
जब पिता की आंखों का में सितारा था,
और मां का में दुलारा था।
पर ले गया वो बचपन ये सब कही दूर,
क्योंकि महज़ वो तो एक टूटता हुआ तारा था।
क्योंकि महज़ वो तो एक टूटता हुआ तारा था।
By Saniya Kher

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