टुकड़ों में नींद
By Chanchal Sharma
कुछ रोज़ से तसव्वुर में था कि मैंने खुद को नहीं बांट रखा सब में बराबरी में
पूरी चादर को एक साथ गिरफ्त करने में आखिरकार कोई ना कोई सिरा अनचाहा छूट ही जाता है
इसी पशोपेश के मद्देनजर नजर पड़ी एक कश्ती पर जिसे दरिया में ला बस भूल चुका हूं
जो काफिर की तरह साहिल को तलाशती किसी अनजान सफर में गोते लगा रही है
इसी तरह एहतराम बरतते हुए नींद को मैंने कई टुकड़ों में बांट दिया
एक मुक्तस नाम किया ख़्वाब को जो बंजर ज़मीन की तरह बारिश की तलाश में है
कुछ टुकड़ा दे दिया अपनों को जिनकी लाख कुर्बानियों से आज में जिंदा हूं
बच्चे दो हिस्से फिर,
सिर्फ एक दूजे को राख बना अपने जख्मों पर फेर लिया
और दूजे को गले लगा बस वहीं का वहीं छोड़ दिया...
By Chanchal Sharma

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