झिरी से झाँकती धूप
By Vandna Sonu
पता है, तुम नहीं आओगे..
नहीं आऐ, फिर भी नजरे ढूंढ रही है..
कितनी पगली हूं,,,बंद दरवाजे से झांक रही हूं.... खिड़की कभी खुल जाती
थी..जाम हो गई लगता है..
ताक में सदा ही रहती हूं मैं..,तुम आऐ कि तुम आऐ।
आस तुम्हारे आने की घटती ही नहीं..वो रूप बदल बस कभी ऐसे और कभी
वैसे तडपाती ही रहती है।
तडप अपनी कम करने को..तुझसे मिलने मैं जो आती हूं.. दरवाजे तुम
बंदकरके…खिडकी पर परदा लगाते हो...
टूटे शीशे से झलक हल्की सी जो दिख जाती है...दिलमेरा भरमा जाती
है..एक चैन मुझे दे जाती है।
टूटे शीशे पे गत्ता तुम लगा दोगे...या नया शीशा लगवा लोगे..
फिर झलक तुम्हारी पाने को मैं तरस तरस मर जाऊंगी..
By Vandna Sonu

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