ज्योति-पर्व
Updated: Dec 5, 2022
By Sandeep Rohit
रात अमावस की, फैला चहु-ओर अँधियारा है,
नन्हे दीपक ने आज फिर तम को ललकारा है,
स्याह रात है या, है यह अग्निपथ ?
जल रहे हैं दीपक अनगिनत, अनुशासित , पंक्तिबद्ध,
लो आ गया फिर ज्योति-पर्व
बुझते लौ को अपनी परवाह नहीं
उसकी डूबती साँसे दे रही सन्देश यही
आरम्भ हो या अंत हो, हौसलें बुलंद होने चाहिए
जीत हो या हार हो , बस कोशिश मुकम्मल होनी चाहिए
By Sandeep Rohit

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