जो यहां कभी ना आएंगे
By Jyoti Singh
क्या मदमस्त यह टोली है,
बस एक रंग की होली है
हरे, गुलाबी, नीले, पीले
रंगों के नाम भी होते थे
तुमसे पहले,
मुझसे पहले,
इस धर्म - जिहाद से भी पहले,
कुछ जश्न अलग ही होते थे
बस अब तो बाज़ारों में,
इक लाल रंग ही बिकता है
सबके अंदर तो दौड़ रहा,
फिर बाहर क्यूँ यह दिखता है
तुमसे छुपकर, मुझसे छुपकर
सबसे छुपकर,
दो दोस्त वहाँ पर बैठे हैं
जो भोग यहाँ तुम देते हो,
वो वहाँ साथ में खाते हैं
जो चादर यहाँ चढ़ाते हो,
वो ओढ़ साथ सो जाते हैं
वह भजन-अज़ान सुनते रहते,
इक काम यही बस रहता है
क्या सुंदर फूल महकते हैं,
क्या बढ़िया खाना मिलता है
अब भेद तो तुम हो जान गए,
इनकी असलियत पहचान गए
फिर छोड़ो तुम यह लड़ाई अब,
बड़ी थकान हो आई अब
जो अब भी तुम ना मानोगे,
जो अब भी खून बहाओगे,
बड़ी मुश्किल, देख हो जाएगी
यह अनबन बढ़ती जाएगी
जब सभी हाथ खंजर होगा,
बड़ा भयंकर,
बड़ा भयानक,
इस धरती का मंज़र होगा
कि देख जिसे,
भगवान् भी थर-थर काँपेंगे
और हम सब मरना चाहेंगे
फिर रख लेना,
अपने अल्लाह, अपने इश्वर
अपनी अज़ान, अपने भजन
जिन्हें गाकर उन्हें बुलाओगे
फ़ुर्सत में बैठे होंगे वो,
पर यहाँ कभी ना आयेंगे
फिर ग़लती अपनी दोहराने,
वो यहाँ कभी ना आयेंगे
By Jyoti Singh

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