"जो कविता होती है"
By Shweta Khati
सूखी हुई जमीं, हरित भूतल होती है
कभी बादल,
कभीसमुद्रहोतीहै
आकारलेतीअंतरालमें,
और कभीबरसताजलहोतीहै।
कभीतिनके-सीउगआतीहै
टूटेहुएगमलेकेपास,
कभीरूठेहुएबच्चेके
बिखरेंखिलौनों-सीउदास ।
घरकेआँगनमेंपलकेंबिछाएँ
बूढ़ीघरमेंजैसेमाँहोतीहै,
खामोशपिताकीनजरों -सीवो
बेचैनदीवारेंघरकीहोतीहैं ।
व्याकुलतामेंप्रेयसीकी
नीर-सीछल-छलबहतीहै,
बहताकाजलऔरनैनादो
अविरामबहुतहलचलहोतीहै।
शोरऔरसन्नाटेकेबीच,
शब्दकभीनिशब्दहोतीहै ।
पल-पलबदलती-सी,
कभीमैंऔरकभीतुमहोतीहै।
“जो कविता होती है”।।
By Shweta Khati

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