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जीवन' से ओतप्रोत ये रंगोली...(दिवाली की यादें)

Nov 23, 2022
2 min read

By Seema Sharma


हां...देखो तो कितने सुंदर रंग बिखरे हैं...मेरे आंगन में।

नहीं नहीं, बिखरे नहीं हैं ...

ये तो किसीने बहुत...

हां बहुत नज़ाकत से संजोए हैं,

सजाए हैं,

एक एक रंग का बाकायदा चयन करके।

वो भी अनेकों बार विचारों के तराज़ू मैं तोल तोल कर

सोच सोच कर

इस रंगोली रूपी

चयनिका में सजाये है।


मैंने देखा है 'उसे' मन ही मन बुदबुदाते हुए,

मानो पूछ रही हो 'उससे' भी,

और स्वयं से भी।

'ये ठीक रहेगा, या ठीक नहीं रहेगा'...

फिर अपने पति ( यानी की मेरे बेटे ) की तरफ ताकते हुए,

मानो आंखों ही आंखों में

उसका अनुमोदन लेते हुए।





ये सामंजस्य, ये तन्मयता औ

तल्लीनता,

मुझे यकायक अचंभित कर रही थी।

मैं तो बस यूं ही बैठी थी,

उनके पास, उनको निहारती।

मन ही मन उन पलों को सहेजती...

क्योंकि उनके जाने के बाद,

ये ही तो वो पल थे जो मुझे उनके होने का अहसास दिलाएंगे।


एक बार बोला था 'उससे', जब उसकी पहली दिवाली थी..

बहू से ज़्यादा वो मेरी बेटी थी।

"क्या मेरे आंगन में रंगोली बनाओगी?"

वो दिन है और आज का दिन है...

हर दिवाली उसने ये वादा निभाया।

अपने आप, बिना याद दिलाए,

वो भी पूरी लगन से।


उसके आने से पहले ही, 'ऐमेजोंन' से रंगों का 'पार्सल' आ चुका था।

और आने के बाद 'डिज़ाइन' का चुनाव भी अपने पति के साथ मिलकर हो चुका था।

अब तो बस सही तारीख़ पर,

उस रंगोली को मेरे आंगन में,

उकेरना बस था।


दोनों को आपसी ताल मेल के साथ रंगोली बनाते देखना

भी मानो अपने आप में

बड़ा लुभावना अनुभव था।

पूरी योजना के साथ,

इस काम को अंजाम जो दिया जा रहा था।


एक दूसरे की हां स्वीकारते,

लड़ते झगड़ते, बहस करते करते,

रंगोली कब पूरी हो गई ...

पता ही नहीं चला।

ये मन भावन रंगों का गुलदस्ता मानो कठिन जीवन को सरल बनाता नज़र आया।


पति पत्नी जीवन रूपी डगर पर दो पहियों के समान होते हैं।

'कितनी बार सुना है'...

पर आज एक नई दिशा, मानो ये रंगोली मुझे दिखा रही थी।

दोनों का एक दूसरे से एकमत होना और भिन्न भी होना ...

मानो जीवन में सामंजस्य बिठाने का सबक दे रही था।

मिलजुलकर रंगों का निर्णय लेकर आगे बढ़ना...

फिर एक दूसरे से जो गलती हो रही हो,

उसे ठीक करना।

और जो काम एक से नहीं हो पा रहा हो,

वहां तुरन्त उस काम को अपने हाथों में ले लेना।


वाह क्या बात है...

ये तो रंगोली नहीं,

मानो जीवन की पहेली सुलझाने की कोई राह हो।

देखते देखते, रंगोली बन कर तैयार हो गई।

जीवन रूपी आँगन भी सजा गई...

और इस कठिन जीवन को कितना सरल और तरल भी बना गई।

ये रंगोली तो जीवन की सीख साबित हो गई...

और मन के आँगन में भी,

अपने रंगों की एक अलग ही छाप और अनुभूति छोड़ गई।

यूं लगा मानो ये रंगोली कोई साधारण रंगोली नहीं थी,

ये तो 'जीवन' से ओतप्रोत रंगोली थी।


By Seema Sharma




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