जीवन दर्शन
By Mohan Jha
शामो - सहर को नित नया आयाम दे तूं।
चलते रहो, बढ़ते रहो, थककर भी न विश्राम ले तूं।।
तुझमें ही तो है गंध क्षिति का,
ध्वनि बीज भी आकाश से तूने है पाया ।
रंग है जल का, मलय स्पर्श भी है,
दहकते अनल का है तेज नस नस मे समाया।।
निःशब्द मत रह, शब्द दे फिर शब्द को अंजाम दे तूं,
चलते रहो .............
चिलचिलाती धूप की भीषण तपिश हो,
बारिशों की बूंद से भींगी हो काया।
हो अमावस की घनी अंधेर या फिर,
धवल शशि की रौशनी से निशि नहाया।।
पर सदा सत्कर्म से सद्फल मगर निष्काम दे तूं।
चलते रहो ..............
हो शून्य जब सारे नियामक देह के,
ना स्नेह हो तब भी कलुष, तम, भेद से।
संज्ञा छुटेगा जब तेरा अव्यय से होगा सामना,
हो चित्त स्थिर सजग मन शाश्वत नियम को साधना।।
इस भाव का कर ध्यान फिर, अविचल सुखद मुस्कान दे तूं ।
चलते रहो, बढ़ते रहो, थककर भी न विश्राम ले तूं।।
By Mohan Jha

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