जीवन की कहानी एक पत्ते की ज़ुबानी
Updated: Jan 12, 2023
By Vidhi Kumbhat
वायु की चादर ओढ़े, न जाने कहाँ खिंचा जा रहा था मैं
हर बंधन को तोड़े, न जाने किस ओर बढ़ता जा रहा था मैं
कई कठिनाइयाँ मेरे रस्ते में आयी,
किसी ने पटका, तो किसी को मैं खटका,
तो किसी ने ज़मीन से उठाकर, कुछ पुष्पों के संग पिरोकर, मेरी सुंदरता बढ़ाई
कुछ हसीन पलों ने सफर मज़ेदार बनाया
रामु काका का टकला और मास्टर जी का चश्मा,
इन पर आराम करने में मुझे खूब आनंद आया
किसी ने पान की तरह चबाया मुझे,
तो किसी नादान ने तोड़ - तोड़ कर रुलाया मुझे
पर कुछ मिले ऐसे भी लोग, जिन्होंने किताब के उस महत्वपूर्ण पन्ने की हिफाज़त, मुझे करने दी,
और हर बार, आगे वाले पन्ने तक पहुँचाने की हर संभव कोशिश की
पर एक दिन, फिर से हवा का झोंका आया,
हर अच्छा-बुरा पल केवल एक याद बनता पाया
पहुँच गया मैं भी उस मिटटी में,
पर इस बार मुक्त हो गया मैं जीवन के बंधन से
उस मिटटी में पढ़े-पढ़े एक बात समझ आयी ,
चाहे इंसान हो या मामूली पत्ता,
हर कोई, आखिरकार इस मिटटी में ही है मिलता,
फिर क्यों सब पूरा जीवन एक दूसरे से आगे बढ़ने में बिताते है?
सबसे अच्छे बनने के लिए जीवन को एक प्रतियोगिता बनाते है?
क्यों ना इस सुन्दर जीवन का मिलकर आनंद उठाया जाये?
संग मिलकर, खुशियों का एक तोरण सजाया जाए?
By Vidhi Kumbhat

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