जीवन की उड्डयन
By Megha Somani
मैंने मेरे सपनों को बुनते हुए देखा हैं, उन सपनों को बिखरते हुए भी देखा हैं ।
अपनी जेब में आशाएँ की पोटलियों को भरते हुए देखा हैं, और उन्हें रेत की तरह फिसलते हुए भी देखा हैं ।
चेहरे पर मुस्कुराहट देखी है, तो मुस्कुराहट के पीछे की बेचैनी भी देखी हैं।
अपने दिल में ख्वाहिशों की उड़ान भरते हुए देखा हैं, तो उड़ान की डोर को कटते हुए भी देखा हैं ।
अपने आप को कांच की तरह टूटते हुए देखा हैं, तो उन कांच के टुकड़ों को समेटते हुए भी देखा हैं ।
अपने अश्रु को बहते हुए देखा हैं, तो उन्हें खुद पोंछते हुए भी देखा हैं।
अपनी वेदना में व्याकुल होते हुए देखा हैं, तो अगले दिन मृदुहास्य को ओंठ पर लगाकर भी देखा हैं।
इन वर्षों में जिंदगी के कई रंग देखे हैं और उन्हीं रंगों से अपने लिए हौसला, हिम्मत और हंसी के सतरंगी जीवन की नींव रखते हुए देख हैं ।
By Megha Somani

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