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जीत तुम्हारी सुनिश्चित है

Apr 19, 2023
2 min read

By Deepak Bachchan


हर एक की जीत सुनिश्चित है, यदि वो खुद से जीतना सीखे। लड़ाई तुम्हारी खुद से है, मन न हो द्वेष किसी से || जिंदगी तुम्हे जीनी अपनी है,

जीवन का संघर्ष तुम्ही से।

जीत तुम्हारी सुनिश्चित है,

यदि मतलब हो तुम्हारा तुम्ही से ।।

हर एक बेड़ी खुल जायेगी.

हर सुबह शाम, रात तुम से पूछने आयेगी।

क्या तुमने खोया क्या पाया,

जब तुम इस बात को समझ जाओगे।

तुम्हारी सुनिश्चित है,

यदि तुम अपने आप का भ्रम मिटाओगे॥

जिंदगी का फेर बदलता जायेगा,

जब इंसान जिंदगी के ढेर पर बैठकर ।

अपने आप को राजा बनायेगा,

न्याय कानून खुद के लिए होंगे।

न उन कानूनो का किसी और पर रोव जमाएगा

तुम्हारी सुनिश्चित है।

यदि प्राणी खुद के बनाये नियम सबसे पहले निभायेगा

रात जबां हो जाती है,

जब शाम में मिल जाती है।

हर रात अपना दुखड़ा सुबह सुनाना चाहती है

उसका दुखड़ा सुनने के लिए सब सुबह जाती है।

रात बिना सुनाये दुखडा खुद भाग जाती है,

जब इंसान ऐसे ही नियम का पालन निभायेगा

तुम्हारी सुनिश्चित है

यदि इंसान अपना ही फर्ज निभायेगा ||

किस मे दाग, किस मे राग,

कौन गरीब है, कौन अमीर है

क्या जात, क्या पात,

क्या धर्म का बेडा है।

यदि इंसान सबको एक समझे,

ये ही इंसान को जगाने का सवेरा है।

तुम्हारी सुनिश्चित है,

यदि सबके लिए समान तुम्हारा डेरा है।।

हर एक नर हर एक नारी,

विद्याता की पहचान है।




प्यार बांटते जाओ तुम,

सब तो एक समान है।

तुम्हारी सुनिश्चित है,

यदि करो सबका सम्मान है।

जब तु हर वक्त से लड़ जायेगा,

ना समय मे भेद बतायेगा ।

जब तू खुद से वक्त को धनुष बनाकर,

तीर पर तीर छोडता जायेगा ।

फिर तुम्हारे मन का अंधकार मिट जायेगा,

तुम्हारी सुनिश्चित है।

यदि प्रयास पर प्रयास करता जायेगा।

समय के मेले मे जब तू,

खुद को पहचान जायेगा।

तू लिखी वक्त की दास्तां को अपना महमान बनायेगा ।

तू देखना दिन एक वक्त के शिखर पर पहुँच जायेगा,

का प्रचम, बस तू ही तू फैरायेगा ।

जीत तुम्हारी सुनिश्चित है,

जब तू बिन पर के भी उड जायेगा।


By Deepak Bachchan





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