जियो और जीने दो
By Anishka Majethia
“उसने ऐसा किया, वो है ऐसा कर रही!”
ये सब है बुरा और हमारी बरबादी है वहीं,
“ऐसा क्यों किया होगा, उसने किया ये और वो!”
अगर आबाद होना है यारों तो ‘जियो और जीने दो’,
इस दौर में न जाने ऐसा क्या है...
मानव की रगें ईर्ष्या और मुकाबले से भरी है,
कुबूल करो या नकारो, हर किसी में बसते है ये
मानो गुलाम बना दिया हम सबको कलयुग ने,
भाई में भ्रातृत्व नहीं, मानव में मानवता नहीं
क्या लड़ने के अलावा और कोई काम नहीं?
आखिर मिलता क्या है बदला लेने से
कि मनुष्य तैयार हो जाता है सिर काटने दूजे मानव के?
कुछ पलों कि राहत के लिए कु-कर्मो का बोझ क्यों हो बढ़ाते
उतने ही परिश्रम और लगन से श्रमजलबिंदु क्यों नहीं बहाते,
आज भी बड़े कहते है मत दो ध्यान इन सब बातों को
बस सुकून से जियो और दूसरों को जीने दो!
अगर कड़वा लगे तो मान लेना कि सच है कहा
जहाँ ईर्ष्या, मुकाबला और चुगली हो...केवल नर्क है वहाँ,
द्वेष और क्लेश की अग्नि कर देगी राख़ जलाकर
अरे मृत्यु को भी तरस नहीं आता ऐसे लोगों पर,
अपनी चतुराई का करो उपयोग सही
दूसरों को बर्बाद और नीचा गिराने में नहीं!
कपटी मन रख कर ईश्वर को ढूंढते हो !
पहले शुद्ध,नेक एवं निर्मल तो बनो,
क्योंकि किसी को ‘कुरान’ में ‘ईमान’ ना मिला
किसी को ‘गीता’ में ‘भगवान’ ना मिला,
उस इंसान को ‘आसमान’ में ‘खुदा’ मिलेगा?
जिस इंसान को ‘इंसान’ में ‘इंसान’ ना मिला!!!
By Anishka Majethia

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