जिया हूँ मैं।
Updated: Dec 5, 2022
By Hrishal Golchha
ना उमीदी के अंधेरों से घिरा अपनी उम्मीद का चिराग़ बनकर जिया हूँ मैं,
अपने सपनों पर उठे हर एक सवाल का जवाब बनकर जिया हूँ मैं,
अपनी नाकामयाबी पर मिले हर एक ताने का हिसाब बनकर जिया हूँ मैं,
हौसला तो खूब तोड़ा तुमने और निराशा भी खूब जताई,
पर आज अपनी ही हिम्मत का पहाड़ बनकर जिया हूँ मैं,
और,
और बर्बादी पर मेरी हसने वाले तो खूब आए,
पर आज उनकी ही अब्धि में अपनी कामयाबी का तूफ़ान बनकर जिया हूँ मैं।
By Hrishal Golchha

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