जिन्दगी का सफ़र
By Rajesh Kumar Verma
निकल ही पड़ा वह एक दिन
किसी नए मुकाम की तलाश में,
दिल में कुछ अरमान लिए हुए
जाते देखा उसे अज्ञात सफ़र पर,
आशंकाओं से भरा था वह
पर मन में आशा के भाव थे,
मंज़िल उसकी अनजान थी
पर चलते रहने की उमंग थी।
बढ़ते ही जा रहे कदम उसके
असर नहीं था तपती धूप का,
चलता जा रहा वह बिना रुके
मन में आशाओं के दिए लिए।
तन पर थे उसके, फ़टे कपड़े
पांव में थी उसके, टूटी चप्पल,
बयां उसके संघर्ष की कहानी
कर रही थी,उसकी टूटी चप्पल।
बूढ़े मां बाप की ममता से दूर
पत्नी से दूर जाने की कसक,
बच्चों से बिछुड़न का दर्द लिए
दिल कर रहा था उथल- पुथल।
पीछे छूटा गांव छूट गए खेत-खलिहान
जो कभी उसके लिए थे खेल के मैदान,
छूट गए हैं पीछे उसके कुछ अपने यार
जिनके संग बीता उसका अपना बचपन।
बुदबुदा रहा था, वह कुछ मन ही मन
चला जा रहा था वह, कुछ हसरत लिए,
गा रहा था उसका मन आशा के गीत
पथ नया है पर कहीं तो किनारा मिलेगा।
मंजिल भले ही हो उसकी दूर कहीं
खत्म तो होगा ही ये अनजान सफर,
था मन में उसके गजब का विश्वास
चलकर ही पास आएगी मेरी मंज़िल।
छंट जाएगा अंधेरा उजाला होगा नभ में
मन में सफलता का हर्ष-ओ-उल्लास होगा,
मंजिल होगी फतह जब झूम उठेगा मन
अहसास उस पल का बहुत ही सुन्दर होगा।
मन में आशाओं के दीप जलेंगे
चेहरे पर उसके खुशी के भाव होंगे,
पग-पग बढ़ता जा रहा था वह
इन्हीं आशाओं को दिल में समेटे हुए।
सुनसान सी अनजान डगर पर
देखा है मैंने उसे कहीं जाते हुए,
तन-मन उसका उमंग से भर गया
देखा जब मंजिल पास आते हुए।
अपनी मंजिल को करीब देखकर,
आशंकाओं के बादल थे छंट चुके,
आह्लादित हो उठा उसका तन-बदन
सूर्य सा हो रहा था वह प्रज्ज्वलित।
चेहरे पर विजय साफ झलक रही है
देखा मैंने उसे आत्मविश्वास से भरे हुए,
देख उसे मन मेरा भाव विभोर हो गया
देखा जब मैंने उसे खुशी से झूमते हुए।
अपनी ही धुन में चला आ रहा था वह
देखा मैंने उसे खुशी में गीत गुनगुनाते हुए,
वो मुकाम वो हासिल कर चुका था
था जिसकी तलाश में वह अज्ञात सफ़र पर।
By Rajesh Kumar Verma

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