जिंदगी में मुझें कोई समझा नहीं
By Pratiksh Shrivastava
जिंदगी में मुझें कोई समझा नहीं,
भरी भीड़ में रहता तन्हा कहीं,
मुझें हँसता देख यह जलते लोग कहीं,
देखी मुस्कान पर दर्द कोई समझा नहीं।
मुझें अपना कहने वाले यह लोग कहीं,
अपनें को पढ़ी जरूरत तो अपनें ही नहीं,
लड़ा हुँ कहीं जंग में कहीं हारा सही,
लड़ने वाले थे वो अपनें कोई पराये नहीं।
निभाया हर रिश्ता मैंने दिल से सही,
क्यों मिले नहीं वफ़ा कोई बताए तो सही,
जहाँ में पहुचा वह लोग कहते है किस्मत सही,
समझेगा कौन कि मैंने सपने संग किस्मत है खोयी।
समझ गया हुँ में दुनिया की रीत यही,
आपका इस दुनिया में कोई नहीं,
लड़ूंगा हर जंग मैंने ये बात कहीं
सहकर हर दर्द रहेगी चहरे पर मुस्कान वहीं
By Pratiksh Shrivastava




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