जाना पहचाना हाल
By Ateet Maurya
कुछ जाना-पहचाना हाल लग रहा था,
उदासी भरी आँखों को बन्द करके,
वो मुरझाई जो कोने में बैठी थी,
आँखे जब वो खोलती,
देख पाती थी ,जाते हुये लोगों को,
या यूँ कहे , कुछ आस लेकर,
पर देखना चाहती थी खुद को,
जो कभी उसका अपना था,
वो अब स्वप्न हो गया सोचती,
तब नीर भरे नयनों से,
माना हस्ती था जिसको, कहाँ है?
बार-बार शायद अपने खालीपन से पुछती,
सब कुछ लुट गया हो जैसे,
या यूँ कहे उसका हाल टूटे दिल का बयाँ है,
लगता जख्म पहला और गहरा है,
मगर वो नादान तो नहीं,
या यू कहें दुनिया को उसने समझा ही नहीं,
इसलिए वो बेचैन थी,
वो मुरझाई जो कोने में बैठी थी।
By Ateet Maurya

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