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जानवरों जैसे इंसान खुले आम है

Nov 29, 2025
1 min read

By Aditya Nandkumar Garde


जानवरों जैसे इंसान खुले आम है,

शायद इसलिए पिंजरे मजबूत बन रहे हैं। 


मासूम लोग चीखते हैं, पर सबके कान बहरे हैं,

विश्व गुरु भारत के नकाब फिर भी सज रहे हैं। 


जो देश पहले धरती को माँ कहता था बड़े गर्व से,

अब वही देश उसके आंचल को नीलाम कर रहा है। 


चारों तरफ दानवों का मेला लगा हुआ है,

बचे हुए इंसान इंसानियत को ढूंढ रहे हैं। 


दानवों की इस भीड़ में कुछ रौशनी के निशान हैं,

वही लोग अब इंसानियत की कब्र ढूंढ रहे हैं। 


इंसानियत की कब्र भी नीलाम हो गई,

मगर भाषणों में उसके भी रेट बढ़ रहे हैं। 



मासूम परिंदे भी आसमान में डरकर ऊपर जा रहे हैं,

क्योंकि धरती पर इंसान, दानवों से भी नीचे जा रहे हैं। 


नेता मुस्कुराते हैं लाशों के आंकड़ों पर,

मीडिया उस मुस्कुराहट को छुपाने के लिए, लाशों को जिंदा कर रही है। 


वो सच्चाई दिखाता है, वो देशद्रोही ठहराता है, 

जो धर्म का खेल करता है, वही अब नेता कहलाता है। 


रिश्तों के बाजार में अब एहसास बिकते हैं,

दौलत से भरे लोग दिल से दिवालिया है। 


कुत्ते, बिल्ली, गाय, सब डरते है इंसानी नकाब से,

क्योंकि अब शिकारी भी शिकवे बना रहा है। 


मंदिरों में प्रार्थना हैं, मस्जिद में अजान है,

मगर हर दिल में सन्नाटा, शर्मिन्दा इमान है। 


कभी किसी बच्चे की हँसी में था खुदा,

अब उसी बच्चे की रोटी में खुदा का सवाल है। 


जहर हवा में नहीं, सोच में घुल चुका है,

अब अच्छाई सांस भी ले, तो मरने लगती है। 


जानवरों जैसे इंसान खुले आम है,

शायद इसलिए, 

चिड़ियाघर के पिंजरे अब मजबूत बनाए जा रहे हैं। 


By Aditya Nandkumar Garde


 
 
 

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