जागो के अब भोर हुई
By Yogesh Kumar Pradhan
ढली निशाकर की माया
चंचल चकोर कुछ भरमाया
उदय हुआ अब नव प्रदीप
भानु ललित मन इठलाया।
नई सांझ है,नया सवेरा
खिला खगों का पुनः बसेरा
नई उमंगे,नई तरंगे,
नई नई प्राची की रंगे ।
तो त्याग शिथिलता,नव प्रारंभ करो रे
गरजे कृशानु अब तो शारंग धरो रे
समर वक्ष में गर्जन घोर हुई है
जागो के अब तो नव भोर हुई है।।
By Yogesh Kumar Pradhan

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