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जलवायु परिवर्तन

By Vibhav Saxena


अंग्रेजी में एक कहावत है- "Nature Is Perfect." वास्तव में प्रकृति स्वयं में परिपूर्ण है। ईश्वर ने मानव को जो अनमोल उपहार प्रदान किए हैं, उनमें प्रकृति सर्वोत्तम है। प्रकृति के माध्यम से ही हमें पर्वत, नदी, प्रचुर मात्रा में जल, पेड़, पौधे, प्राणवायु, फल, फूल, वनस्पतियां, जड़ी-बूटियां, विभिन्न जीव-जंतु तथा अन्य पदार्थ प्राप्त हुए हैं जिनका कुशलतापूर्वक उपयोग करते हुए मानव ने अपने सुखद जीवन की कल्पना को साकार किया है। ध्यातव्य है कि प्रकृति ने पर्यावरण में समस्त कारकों का एक निश्चित संतुलन निर्धारित किया है और जब भी यह संतुलन बिगड़ता है तब न केवल मानव, बल्कि अन्य जीव-जंतुओं के अस्तित्व पर भी संकट उत्पन्न हो जाता है। आज विकास की अंधी दौड़ में मानव में प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन और अनियमित उपयोग के मार्ग का चुनाव किया है जिसके कारण नित्य नई समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं और मानव एवं विभिन्न जीव जंतुओं के साथ-साथ प्रकृति का अस्तित्व भी संकट में पड़ गया है। इनमें जलवायु परिवर्तन एक प्रमुख समस्या है जिससे आज संपूर्ण विश्व बुरी तरह जूझ रहा है किंतु इसका कोई भी स्थाई समाधान अभी तक खोजा नहीं जा सका है।


जलवायु परिवर्तन को समझने से पूर्व यह समझना आवश्यक है कि जलवायु क्या होती है? सामान्यतः जलवायु का आशय किसी दिये गए क्षेत्र में लंबे समय तक औसत मौसम से होता है। जलवायु किसी स्थान विशेष के वातावरण की दशा को व्यक्त करती है। सामान्यतः यह शब्द मौसम का समानार्थी माना जाता है परंतु जलवायु और मौसम में अन्तर है। जलवायु बड़े भूखंडो और कालखंड के लिये ही प्रयुक्त होता है जबकि मौसम अपेक्षाकृत छोटे कालखंड और छोटे स्थान के लिये प्रयुक्त होता है।


किसी स्थान पर 30 साल या उससे अधिक समय तक मौसम की औसत स्थिति जलवायु कहलाती है। पृथ्वी पर विभिन्न प्रकार की जलवायु है। उदाहरण के लिये गर्म क्षेत्र आमतौर पर भूमध्य रेखा के सबसे करीब होते हैं। वहाँ पर अधिक गर्म जलवायु होती है क्योंकि सूर्य की किरणें भूमध्य रेखा के ऊपर सीधी पड़ती हैं जबकि उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव ठंडे हैं क्योंकि वहाँ सूर्य का प्रकाश और ऊष्मा सबसे कम पहुँचती है।


मौसम और जलवायु के बीच का अंतर यह है कि मौसम में वातावरण में अल्पकालिक (मिनट से महीने तक) परिवर्तन होते हैं, जबकि जलवायु दीर्घकालिक परिवर्तन को कहते हैं। अधिकांश स्थानों पर मौसम मिनट-दर-मिनट, घंटे-दर-घंटे, दिन-प्रतिदिन और माह-दर-माह बदल सकता है जबकि जलवायु एक लंबे समयांतराल पर बदलती है।

जलवायु को प्रभावित करने वाले कारक हैं- अक्षांश, ऊँचाई, समुद्री धाराएँ, स्थलाकृति और पवनें आदि। जब किसी क्षेत्र विशेष के औसत मौसम में परिवर्तन आता है तो उसे जलवायु परिवर्तन कहते हैं। जलवायु परिवर्तन को किसी एक स्थान विशेष में महसूस किया जा सकता है एवं संपूर्ण विश्व में भी।


स्पष्ट है कि जलवायु परिवर्तन औसत मौसमी दशाओं के ऐतिहासिक रूप से बदलाव की प्रक्रिया है। जलवायु परिवर्तन के अंत: कारकों में जलवायु प्रणाली के भीतर ही प्राकृतिक प्रक्रियाओं में हो रहे परिवर्तन शामिल हैं (जैसे- उष्मिक परिसंचरण), वहीं बाह्य कारकों में प्राकृतिक (जैसे- सौर उत्पादन में परिवर्तन, पृथ्वी की कक्षा, ज्वालामुखी विस्फोट) और मानवजनित (जैसे- ग्रीन हाउस गैसों और धूल के उत्सर्जन में वृद्धि) सम्मिलित हो सकते हैं।


पृथ्वी की जलवायु गतिशील है जो प्राकृतिक-चक्र के अनुसार सदैव बदलती रहती है अर्थात जलवायु परिवर्तन एक प्राकृतिक क्रिया है, किन्तु मानवीय गतिविधियों द्वारा जलवायु परिवर्तन की दर में आई वृद्धि चिन्ता का विषय है। प्राकृतिक कारणों से होने वाले जलवायु परिवर्तन से पर्यावरण प्रभावित होता है तथा मानवीय गतिविधियों द्वारा पर्यावरण प्रदूषित होने से जलवायु प्रभावित होती है। इस प्रकार जलवायु एवं पर्यावरण परस्पर एक दूसरे को प्रभावित करते हैं।


आज पर्यावरण प्रदूषण और ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में वृद्धि के कारण बढ़ते तापमान ने जलवायु परिवर्तन की स्थिति को और गंभीर बना दिया है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन के महासचिव पेटेरी टालस के इस कथन में भी यह बात समझी जा सकती है- "अब तक का सबसे गर्म वर्ष 2016 था, लेकिन जल्द ही इससे अधिक गर्म वर्ष देखने को मिल सकता है।" आगामी दशकों हेतु लगाए गए एक पूर्वानुमान से संकेत मिलता है कि अगले पांच वर्षों में एक नया वार्षिक वैश्विक तापमान रिकॉर्ड मिलने की संभावना है। इसी प्रकार यदि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के प्रयास नहीं किये गए तो सदी के अंत तक पृथ्वी की सतह का औसत तापमान 3 से 10 डिग्री फॉरनहाइट तक बढ़ सकता है।


जलवायु परिवर्तन और धरती के तापमान में वद्धि के कारण हिमनद और ध्रुवीय प्रदेशों की बर्फ पिघलने की रफ्तार बढ़ गई है जिसके परिणामस्वरूप महासागरों का जल स्तर औसतन 27 सेंटीमीटर ऊपर उठ चुका है। यदि वायुमंडल में ग्रीन हाउस गैसों के जमाव का क्रम जारी रहा तो धरती के तापमान में वृद्धि होती रहेगी, परिणामस्वरूप हिमनद और ध्रुवीय इलाकों की बर्फ पिघलने की गति बढ़ने से सागर तटीय इलाकों के डूबने का खतरा बढ़ जाएगा। इसके अतिरिक्त कार्बन डाइऑक्साइड की बढ़ती मात्रा के कारण महासागरीय पारिस्थितिकी तंत्र भी प्रभावित हुए हैं। आज महासागरीय जल में अम्लता की मात्रा बढ़ने से महासागरों में रहने वाले जीवों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।


तापमान में वृद्धि और वनस्पति पैटर्न में बदलाव ने पशुओं एवं पक्षियों की कुछ प्रजातियों को विलुप्त होने की कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है। विशेषज्ञों के अनुसार, पृथ्वी की एक-चौथाई प्रजातियाँ वर्ष 2050 तक विलुप्त हो सकती हैं। जैसे कि वर्ष 2008 में ध्रुवीय भालू को उन जानवरों की सूची में जोड़ा गया था जो समुद्र के स्तर में वृद्धि के कारण विलुप्त हो सकते थे।


एक अनुमान के अनुसार भविष्य में जलवायु परिवर्तन के परिणामस्वरूप मलेरिया और डेंगू जैसी बीमारियाँ और अधिक बढ़ेंगी तथा इन्हें नियंत्रित करना मुश्किल होगा। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आँकड़ों के अनुसार, पिछले दशक से अब तक हीट वेव्स से लाखों लोग प्रभावित हो चुके हैं। लंबे समय तक चलने वाली हीट वेव्स ने वनाग्नि हेतु उपयुक्त गर्म और शुष्क परिस्थितियाँ उत्पन्न की हैं। ब्राजील के अमेजन वन में आग लगने की घटनाएँ वर्ष 2018 से 85 प्रतिशत तक बढ़ गई हैं।


वातावरण में अधिक ऊर्जा के जुड़ाव से वैश्विक वायु पद्धति में भी परिवर्तन हो रहा है। वायु पद्धति में परिवर्तन के परिणामस्वरूप वर्षा का वितरण असमान होगा। भविष्य में मरुस्थलों में अधिक जबकि पारम्परिक कृषि वाले क्षेत्रों में कम वर्षा होगी। इन परिवर्तनों से विशाल मानव प्रव्रजन को बढ़ावा मिलेगा जो सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक ताने-बाने को प्रभावित करेगा।


जलवायु परिवर्तन के कारण फसल की उपज कम होने से खाद्यान्न समस्या उत्पन्न हो सकती है, साथ ही भूमि निम्नीकरण जैसी समस्याएँ भी सामने आ सकती हैं।

एशिया और अफ्रीका तेजी से बढ़ते तापमान के कारण सूखे की चपेट में आ सकते हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, कम ऊँचाई वाले क्षेत्रों में गेहूँ और मकई जैसी फसलों के उत्पादन में पहले से ही गिरावट देखी जा रही है। इसी प्रकार वातावरण में कार्बन की मात्रा बढ़ने से फसलों की पोषण गुणवत्ता में कमी आ रही है। यूरोप में गर्मी की लहर के कारण फसल उत्पादन लगातार गिर रहा है। जलवायु परिवर्तन के फलस्वरूप बाढ़, सूखा तथा आँधी-तूफान जैसी प्राकृतिक आपदाओं में वृद्धि के कारण स्थानीय खाद्यान्न उत्पादन में कमी होगी जो भुखमरी और कुपोषण का कारण बनेगी।





जलवायु परिवर्तन का प्रभाव मानव स्वास्थ्य पर भी पड़ रहा है। जलवायु में उष्णता के कारण श्वास तथा हृदय सम्बन्धी रोगों में वृद्धि हो रही है। भविष्य में विकासशील देशों में पेचिश, हैजा, क्षय रोग, पीत ज्वर तथा मियादी बुखार जैसी संक्रामक बीमारियों की बारम्बारता में वृद्धि होने और कुछ देशों में मलेरिया, डेंगू, पीला बुखार तथा जापानी बुखार के तीव्र प्रसार से स्थितियां गंभीर हो सकती हैं। इसके अतिरिक्त फाइलेरिया तथा चिकनगुनिया का भी प्रकोप बढ़ेगा।


जलवायु परिवर्तन की समस्या के समाधान के लिए वैश्विक स्तर पर किए गए प्रयासों में वर्ष 2015 में किया गया पेरिस समझौता एक महत्वपूर्ण उपाय के रूप में जाना जाता है। पेरिस जलवायु समझौते में यह लक्ष्य तय किया गया था कि इस शताब्दी के अंत तक वैश्विक तापमान को 2⁰C के नीचे रखने की हरसंभव कोशिश की जाएगी।


जलवायु परिवर्तन पर अंतर सरकारी पैनल (आईपीसीसी) जलवायु परिवर्तन से संबंधित वैज्ञानिक आकलन करने हेतु संयुक्त राष्ट्र का एक निकाय है जिसमें 195 सदस्य देश हैं।

यह वैश्विक जलवायु स्थिति का आकलन तैयार करने और जलवायु परिवर्तन को टालने के लिए आवश्यक उपायों पर दिशा-निर्देश भी तैयार करता है। आईपीसीसी ने अपनी छठी जलवायु आकलन रिपोर्ट के अंतिम भाग को हाल ही में प्रकाशित किया है जिसमें कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन के सबसे बुरे प्रभाव को रोकने का अवसर बड़ी तेजी से कम होता जा रहा है।


इस रिपोर्ट में कुछ शमन प्रयासों के अच्छे प्रभावों का भी उल्लेख है और अक्षय ऊर्जा ने इस संबंध में ध्यान आकर्षित किया है। पवन टरबाइन, सौर पैनल इत्यादि अक्षय ऊर्जा प्रौद्योगिकियों को लगभग समूचे विश्व में तेजी से प्रयोग में लाया जा रहा है और इसका वैश्विक स्तर पर अच्छा प्रभाव पड़ा है। इस रिपोर्ट के अनुसार जीवाश्म ईंधन के उपयोग पर अंकुश लगाना होगा।


रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि लक्ष्यों को हासिल करने के लिए सिर्फ उत्सर्जन पर अंकुश लगाना पर्याप्त नहीं होगा, वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड को भी निकालना होगा। विभिन्न देश खेती की पद्धतियों में सुधार के साथ-साथ वनों के विस्तार के माध्यम से कार्बन उत्सर्जन को नियंत्रित कर सकते हैं। साथ ही धनी देशों द्वारा निम्न-आय वाले देशों को आर्थिक सहायता प्रदान किये जाने की भी आवश्यकता है।


संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क सम्मेलन (UNFCCC) एक अंतर्राष्ट्रीय समझौता है जिसका उद्देश्य वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को नियंत्रित करना है। इस संदर्भ में, 26th Conference of parties (COP26) to the United Nations Framework Convention on Climate Change (UNFCCC) एक ऐसा मंच था जहां विश्व को सामूहिक रूप से अपनी आगामी जलवायु कार्रवाई की रणनीति को आकार देने और इसे वर्तमान की अनिवार्यता के आधार पर सीखने, भुलाने और रूपांतरित करने का अवसर मिला।


यदि भारत द्वारा जलवायु परिवर्तन के संबंध में किए गए प्रयासों की बात करें तो जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्ययोजना (NAPCC) का शुभारंभ वर्ष 2008 में किया गया था। इसका उद्देश्य जनता के प्रतिनिधियों, सरकार की विभिन्न एजेंसियों, वैज्ञानिकों, उद्योग और समुदायों को जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न खतरे और इससे निपटने के उपायों के बारे में जागरूक करना है। इसके अलावा भारत के राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों द्वारा राज्य कार्ययोजनाएं तैयार की गई हैं जो NAPCC के उद्देश्यों के ही अनुरूप हैं।


अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन सौर ऊर्जा से संपन्न देशों का एक संधि आधारित संगठन है जिसकी शुरुआत भारत और फ्राँस ने 30 नवंबर, 2015 को पेरिस जलवायु सम्‍मेलन के दौरान की थी। ISA के प्रमुख उद्देश्यों में वैश्विक स्तर पर 1000 गीगावाट से अधिक सौर ऊर्जा उत्पादन क्षमता प्राप्त करना और 2030 तक सौर ऊर्जा में निवेश के लिये लगभग 1000 बिलियन डॉलर की राशि को जुटाना शामिल है।


वर्तमान परिस्थितियों के दृष्टिगत यह कहा जा सकता है कि आज विश्व को जलवायु परिवर्तन से सामूहिक रूप से निपटने की आवश्यकता को स्वीकार करना चाहिए। सभी देशों को अपने घरेलू जलवायु प्रयासों के लिए समानता और न्याय पर आधारित कोशिशों को अपनाना होगा। जलवायु न्याय के लिए, यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि समाज के तुलनात्मक संपन्न वर्गों या अर्थव्यवस्थाओं के ऐतिहासिक कार्यों का दंश अस्थिर और संवेदनशील समुदायों को न सहना पड़े। वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन अनुकूलन के विभिन्न प्रयासों के साथ-साथ समाज, अर्थव्यवस्था तथा पर्यावरण के कमजोर वर्ग के उत्थान को पर्याप्त महत्व देने की आवश्यकता है।


उपर्युक्त विश्लेषण के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि वैश्विक जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों को देखते हुए सबसे बड़ी आवश्यकता यह है कि ग्रीन हाउस प्रभाव के लिए उत्तरदायी गैसों के उत्सर्जन पर रोक लगाई जाये जिससे वैश्विक तापवृद्धि पर प्रभावी नियंत्रण हो सके और विश्व को जलवायु परिवर्तन के सम्भावित खतरों से बचाया जा सके।


आज बढ़ती मानवीय गतिविधियों एवं आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु प्राकृतिक संसाधनों का अन्धाधुन्ध प्रयोग समस्या की मूल जड़ है। इनका उपयोग समुचित व सन्तुलित मात्रा में किया जाना आवश्यक है। अन्यथा भविष्य में होने वाली अनहोनी को टाला नहीं जा सकेगा। जैसा कि हम जानते हैं किसी स्थान की जलवायु स्थिरता वहाँ की कृषि, आमदनी, रोजगार, जल-जीवन, समाज एवं संस्कृति को प्रोत्साहित करते हुए स्थायित्व प्रदान करती है। इसलिये हम सभी को एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में पारितंत्र को स्वच्छ एवं स्थायी बनाए रखने में अपनी भूमिका निभाने के साथ-साथ पर्यावरणीय जागरुकता को जन-जन तक पहुँचाना होगा।


By Vibhav Saxena




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