जब बच्चे थे हम।।…
By Abhimanyu Bakshi
आज मसरूफ ज़िंदगी के दरमियान यूँ ही इक ख़्याल आया,
कि वो भी क्या दिन थे जब दिन ढलता ही नहीं था।
मासूमियत की सियाही से संजोई दास्तान बचपन की,
ख़ुदा नफ़रत के अल्फ़ाज़ उसमें लिखता ही नहीं था।
दोस्त नादान भोले-भाले कभी भी कुछ भी बक देते थे,
पर किसी की कोई बात कोई दिल में रखता ही नहीं था।
उम्मीदों का समंदर था लबरेज़ सपनों से,
वो नादान किनारे तक तो बहता ही नहीं था।
ये तो अब संजीदा हो चुके हैं क़िस्से-बातें आपसी,
कल की वरना कोई चिंता करता ही नहीं था।
आज़ाद परिंदे तो थे मगर दायरे में रहकर उड़ते थे,
बहकी हवा से तो परों का नाता ही नहीं था।
ग़लतियाँ हमारी शरारतों के नाम पर सब को गवारा थीं,
आँखों में चालाकी का मंसूबा दिखता ही नहीं था।
ख़ुदा के अज़ीज़ बस इसी लिए थे क्योंकि बच्चे थे हम,
हम में से वरना कोई इबादत तो करता ही नहीं था।।..
By Abhimanyu Bakshi

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