जंगली ख्याल (Wild Thoughts)
By Karan Handa
कुछ जंगली ख्याल हैं
मेरे बंजर दिल में,
आग को छू लूँ मैं,
हवा में मिल के,
पानी सा शांत हो जाऊं
धूप से मिल के !
नीले आसमान कि जिस्म से,
बरसती ओस की बूंदों में बस्ता हूँ मैं
और ये शाम सावली सी,
केसू सहलाने बैठी
दुल्हन बने मुझे निहारती है
और वस्ल की घड़ी, अँधेरा जब छाने लगा,
मैं और शाम सावली फना हो जाते है ,
इक दूजे में,
कुछ जंगली ख्याल है,
मेरे बंजर दिल में
आग को छू लूँ मैं,
हवा में मिल के,
पानी सा शांत हो जाऊं
धूप से मिल के !
तड़प ही तो हैं इश्क़
हिजर ही तो हैं चाहत
जो डूब गया उसे समंदर में ही हैं राहत
और क्यों अजीब नही लगती
चलती फिरती लाशे,
शहर रंगीन में,
कुछ जंगली ख्याल है,
मेरे बंजर दिल
By Karan Handa

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