ज़िंदगी करीब से
By Richa Sengar
देखा जब ज़िंदगी को मैंने करीब से
पाए कुछ लम्हे बहुत अजीब से।
देखा कभी सपनों को पंख लगते हुए।
और अचानक से आशाओं को बिखरते हुए।
कभी ख़ुशी ले जाए आसमां पर।
और अगले ही पल कदम महसूस होते जमीन पर।
सोचती हूं सब है मेरे नसीब से।
देखा जब ज़िंदगी को करीब से।
लोगों को रंग बदलते देखा।
कभी जज्बातों से तो कभी आंसुओं से खेलते देखा।
तो कभी किसी की हिम्मत बनते देखा।
पता नहीं ज़िंदगी चलती किस तहजीब से।
पर देखा जब करीब से।
पाए कुछ लम्हे अजीब से।
मौसम की मनुहार देखी।
खुशियों की बहार देखी।
कभी देखा संबंधों के मधुर मिलन को।
और कभी देखा बिखरे रिश्तो की टूटन को।
ह्रदय उद्वेलित कभी बिखरे सपनों की चुभन से।
मन प्रफुल्लित कभी आशाओं की उड़न से।
पाए कुछ लम्हे अजीब से।
देखा जब ज़िंदगी को करीब से।
देखा जब ज़िंदगी को करीब से।
By Richa Sengar

Comments