छोटी सी वो लड़की
By Anishka Majethia
छोटी-सी एक लड़की, नन्ही और प्यारी दिख रही थी ना जाने क्यों मुझे उसमे दुनिया सारी, बड़ी मासूम सी, निर्दोष और थी वो निष्काम न जाने किसकी बेटी थी...कोई राजा या कोई रंक आम,
न जाने कहाँ से आई थी, न जाने कहा रहती चल रही थी जैसे कोई नदी तेज़ी से बहती, उसके अंदर छुपी थी जैसे प्रकृति सारी मगर अभी कहाँ जाने वो दुनियादारी,
रेशम सी जुलफ़े, क्या उसकी अदाएँ आ जाती चेहरे पर जब बहती हवाएँ, कूट-कूट के भरा था उसमे सौंदर्य जैसे छलक रहा था उसमे ऐश्वर्य,
आँखे उसकी मृगनयनी,
था उसमे बड़ा आकर्षण हँसती, खेलती, गुनगुनाती…
जा रही थी शायद ईश के दर्शन !
चलती ही जा रही थी जैसे नदी का बहाव ढूंढ रही थी शायद वो जीवन की धूप में छाव, फिर चलाने लगी वो एक सुंदर सी नाव ढूंढ रही थी जैसे जीवन का पढ़ाव,
कूद पड़ी वो नदी के बीचों-बीच शायद जाना चाहती थी इस्स दुनिया से, जो हैं बहुत नीच,
रुक गयी मैं उधर देखने के लिए आती है वो कैसे, खाली हाथ या जल-मोती लिए,
शाम ढलती गयी, नक्षत्र बिखरते गए ना आई वो वापिस जीवन जीने के लिए, ना जाने क्यों उसे मरना था... शायद ये दुनिया और जीवन ही एक सपना था,
थी वो शायद बहुत अनुभवी और दिल से बड़ी याद करने लगी मैं उस शाम की हर घड़ी, लौटी मैं अपने घर लिए आँखों में आँसू जब रखा मैंने मन हम दोनों का तोलने के लिए... तो झुक गया उसकी तरफ पूरा तराज़ू !!!
By Anishka Majethia

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