छोटी नदी
By Sadhana Joshi
शीतली चलती फुहारें वेग से,
दौड़ती है छोड़ कर सब खेल से,
पाहनों को तोड़ती है धार से,
चल रही नदियां हिलोरें मार के।
फेन सा दिखता कहीं है नीर जो,
गिर रहे झरने बने वो क्षीर जो।
शांत लहरें बह रहीं है धीर से,
सींचती जाये लता को पीर से।
शोर गूंजे पाहनों में जोर से,
छल छला कर लहर बहती शोर से।
यौवनी तन पर उमंगें छा रही,
गीत खुशियों के सभी वो गा रही।
पाहनो को चीर कर राहें बनी,
वीर रस में भृकुटी जो है तनी।
श्वैत अश्वो की बनी वो सारथी,
जीव धरती के सभी को तारती।
झर रहे झरने कई है शान से
झुक रही पुण्य भूमी सम्मान में
आरती की थाल सजती हाथ में,
गीत मुख से निकलते साथ में।
By Sadhana Joshi

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