छुप जा चाँद
By Sasmita Kumari Pradhan
मत देख उस चाँद को ये मेरी आंखें ,
जिसने भरे थे आँखों में इतने सपने ,
पर खो दिए तूने सारे अपने ,
भर दिए आँखों में तूने इतने आंशू ,
बना दिया पराया जो में न चाहूँ |
छुपा ले चाँद अपने आप को काले बादलों में ,
देख न सके ये आँखे तुझे उस काले चादरों में ,
दिन तू मत ढल फिर कभी ,
गगन पर आ न सके ये चाँद फिर कभी ,
जीवन में भरे थे तूने कभी चन्दन ,
भर दिए तूने जीवन में मेरे क्रंदन |
हूँ मैं भी किसी की दुहिता ,
बनना चाहती थी मैं उसकी गृहिता ;
चाँद से माँगा मैंने अपना चाँद ,
पर किया तूने मुझे वहीं बदनाम ;
सोची थी उस चाँद पर बनाऊंगी अपना शीशमहल ,
पर तोड़ दिया सपनों को तुमने डालकर जहर ;
बना दिया तूने मेरी ज़िन्दगी को वीरान ,
है जो चारो तरफ से सुनसान ही सुनसान ;
तुझ से मांगी थी मैंने कितने मन्नत ,
सोची थी ज़िन्दगी बन गयी मेरी जन्नत ;
खाई थी मैंने अपने सारे कश्मे ,
किये थे मैंने अपने सारे रस्मे
मांगी थी मैंने तुझसे मेरा सुहाग ;
यही थी मेरी ज़िन्दगी की अंतिम मुराद ,
भर दिए थे मैंने मांग में सिन्दूर ;
पर कर दिया तूने उसे इतना दूर ,
तू ही है मेरी सिन्दूर का शाक्षी
जो अब भी है मेरी ज़िन्दगी का कांक्षी ;
किये थे मैंने वह शाम करवाचौत ,
अब दिखे रास्ते भर मुझे मौत ही मौत ;
दे दी हैं तूने ज़िन्दगी भर का क्लेश
कर दे तू आज मुझे यही पर शेष |
By Sasmita Kumari Pradhan

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