चिराग-ऐ-सहरी
Updated: Sep 20, 2022
By Abhilasha Kulshrestha
महल की मुंडेर पर टिमटिमाते चिराग-ऐ-सहरी ने बेचैनी से इधर उधर देखा,
सुबह होने को थी, रात की कालिमा चुक रही थी धीरे धीरे;
आकाश के कोने में धीरे से मुस्कुराने को उत्सुक थी लालिमा की रेखा,
सब कुछ रोज़ जैसा एक ढर्रे में बंधा, पर आज माहौल में कुछ बेचैनी थी;
कौन बताएगा मेरी कहानी, कौन देगा मेरा संदेसा, चिराग की कथा अनकही थी।
उसे बहुत कुछ कहना था, बुझने से पहले, बहुत कुछ बताना था नयी चिटकती कलियों को,
कुछ कहना था अंगड़ाई लेती तितलियों से, अस्पताल में अभी अभी जन्मी नन्हीं बिटिया से,
और माँ की ऊँगली पकडे पहली बार स्कूल जा रहे बच्चे से भी।
उसे बताना था अँधेरे से किये अपने संघर्ष के बारे में, हवा के झोंकों से बिना डरे रौशनी बिखेरने के हौसले के बारे में;
तेल कम होने पर भी घने से घने अँधेरे को चीर कर रौशनी पैला देने की सफलता के बारे में;
अकेले रहकर खुद जलकर दूसरों का पथ प्रशस्त करने की अपनी जिजीविषा के बारे में।
उसे बताना था भोर में उठकर जीवन की मृदुल बाहों में खिलखिलाती नयी पीढ़ी को अपने जीवन का निचोड़,
अपनी आस्थाओं की कहानी और अपने अनवरत संघर्ष का इतिहास।
पर किसे कहे, कौन सुनेगा और कब सुनेगा!
पूरब में लालिमा फूट रही थी चिराग उदास था,
तभी एक नन्ही चिड़िया फुदक कर उसके पास आयी, उसकी चमकती उत्सुक आँखें कुछ पूछ रहीं थी।
और! चिराग का संदेसा लेकर वह नन्हीं परी फुदक रही थी पेड़ों पर, मुंडेरों पर और घरों की छत्तों पर।
चिराग बुझ चुका था पर उसकी दास्ताँ सब सुन रहे थे।
By Abhilasha Kulshrestha

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